मंगलवार, 21 नवंबर 2017

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 12 Part 2 ,3

तुम हो प्राण पति 

भक्ति का यही मतलब होता है -जो भगवान से विवाहित हो जाता है वह भगवान् की सारी संपत्ति का मालिक हो जाता है। 

भगवान् से विवाहित होने के लिए तीन काम करने होंगे -जानकी जी ने ये तीनों काम किये :

(१ ) बाग़  में आना -ये बाग  में आना क्या है -सत्संग में आना है बाग  में आना 

संत सभा चहुँ दिस , अमराई -

भवन को कहाँ ढूंढें -सत्संग में जाना पड़ेगा 

मीरा जी ने कहा चले जाओ सतसंग में -

राम जी से मिलने का सतसंग ही बहाना है ,
दुनिया वाले क्या जाने हमारा रिश्ता पुराना है। 

तीर्थों में ढूंढा तुम्हें ,मंदिर में न पाया है  ,
कथा के मंडप में मेरे राम का ठिकाना है।

(१ )जानकी जी संतों के  सानिद्य में गईं। 

(२ )जानकी जी ने सरोवर में स्नान  किया -सरोवर क्या है संत के हृदय में स्थान पाना ,हृदय में प्रवेश पाना सरोवर में स्नान करना है। 

(३ )गौरी (श्रद्धा )की पूजा की 

शुभ की प्यास जितनी बढ़ती जायेगी -समाज सेवा ,गुरु की सेवा और कैसे करूँ ,दान  ,पुण्य मैं और कैसे करूँ ,ये जो शुभ की और -और की जो प्यास है यह जितनी बढ़ेगी  परमात्मा का प्रकाश उतना ही आपकी ओर बढ़ता चला आएगा।पुण्य का शेयर बढ़हाइये। 

जीवन में श्रद्धा चाहिए।   

श्रद्धा बिना धर्म नहीं होइ ....

जानकी जी गुरु पूजन के लिए अष्ट सखियों के साथ मंदिर चलीं गईं। ये जो अष्ट सखियाँ हैं ये और कुछ नहीं - अष्टांग सेवा है योग में जो अष्टांग योग है वही यह अष्ट सेवा है। एक सखी दौड़ती हुई  आई -चलो पूजन बाद में कर लेना पहले भगवान् को तो देख लो -वो दोनों राजकुमार बाग़ में आये हैं ,जो विश्वामित्र जी के साथ आये थे। 

देखन बाग़ कुंवर दोई  आये ...

वय किशोर सब भाँती सुहाई ,

श्याम गौर किमी कहहुँ बखानी। 

गिरा अनयन ,नयन बिनु वाणी  .... 

जाने बिनु न होय परतीति ...

बिनु परतीति होय नहीं प्रीति  

प्रीति  बिना नहीं भगति विहाई 

जिमि खग पति .... 

जिनके मन में लालसा है बस कथा सुनिए -कथा वाचक बस कथा वाचक  होता है, बड़ा है या छोटा है ये मत देखो वक्तव्य देखो उसका । कथा से दर्शन होता है। 

विभीषण से भगवान् ने पूछा-" हमारे पास तक कैसे आ गए" -

बोले विभीषण लंका मेंआपकी कथा सुनी थी , 

"किससे सुनी "पूछा भगवान् ने 

श्री हनुमान से ,कथा सुनते- सुनते ही मेरे मन में यह लालसा पैदा हो गई जिसकी कथा इतनी सुन्दर है वह कितना सुन्दर होगा।उसे चलकर देखा जाए। 



सखी ने कथा सुनाई ,कथा सुनकर जानकी जी में भगवान् के दर्शन की लालसा पैदा हो गई ,पूजा छोड़कर चल दीं ,पूजा तो दर्शन के लिए की जाती है और वह भगवान्  तो द्वार पर ही खड़ा है जिसके लिए पूजा करने बाग़ में जा रहीं थीं । जानकी जी दर्शन को चली हैं चलने से उनके आभूषण बजने लगे। 

खनखन खनखन आभूषण बजने लगे -

कंकण किंकिन नूपुर  धुन......  

भगवान् पुष्प चुन रहे थे -टकटकी लगाकर भगवान् देखते हैं कौन आ रहा है ?भगवान् लक्ष्मण से बोले - लक्ष्मण मेरे मन में बड़ा आकर्षण पैदा हो रहा है ,लगता है  कोई कामदेव आज आक्रमण करने  आ रहा  है। 

लक्ष्मण जी तो भगवान् की सेज हैं अनंत शेष हैं ,शेष नाग हैं सहस्र फणीश्वर, जिस  शैया  पर भगवान् लेटे  रहते हैं वही तो लक्ष्मण हैं ,शैया पर ही तो व्यक्ति अपने मन की बात  कर सकता है।  लक्ष्मण  जी परम -वैराग्य -वान महापुरुष  हैं जैसा इतिहास में दूसरा खोजे नहीं मिलेगा जिन्होनें सिर्फ जानकी जी के सदैव चरण और बिछिया ही देखे हैं ,उन्हें माता कह कर पुकारा है कभी भाभी नहीं कहा है।सुग्रीव जब मार्ग से बीने जानकी  जी के आभूषण दिखाता है (जानकी जी के रावण द्वारा अपहरण के बाद जो मार्ग में उसे गिरे मिले थे ),तब लक्ष्मण कहते हैं मैं इन आभूषणों को नहीं पहचानता क्योंकि मैंने तो माँ के सिर्फ  चरण ही सदैव देखे हैं सिर्फ बिछिया (बिछुवे )पहचान सकता हूँ ,ये शेष आभूषण नहीं। 

फिर भगवान् का यह आकर्षण भक्ति के प्रति है इसलिए भगवान् लक्ष्मण जी से अपने मन की बात कर सकते हैं कह सकते हैं। इसमें कुछ लोगों को अटपटा लग सकता है के भगवान् छोटे भाई के साथ श्रृंगार की बात सांझा कर रहे हैं लेकिन इसमें अटपटा कुछ है नहीं। सारी  श्रृंगार की वार्ता तो बिस्तर पर बैठ कर ही होती है। लक्ष्मण तो भगवान् की सेज़ हैं शैया हैं  अनंत  शेष रूपा। वो तो सारी चर्चा पत्थर की तरह तटस्थ भाव लिए सुन रहे  हैं। लक्ष्मण इस चर्चा का स्वाद नहीं ले रहे हैं सिर्फ भगवान् ले रहे हैं। आम आदमी सोच सकता है अगर भगवान पार्क में बाग़ में ये बात कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते इसलिए भगवान् ने स्पष्ट कर दिया -

जासु बिलोकि अलौकिक शोभा ,
सहज विराग रूप मन मोरा। 
रघुवंसिन करि सहज सुभाउ ,
मन कुपंथ  पग धरहु न काहू ...... 
जेहि सपनेहु  परनारी न हेरी


लक्ष्मण  मैंने  कभी सपने में भी परनारी को नहीं देखा ,पता नहीं विधाता आज क्या चाहता है।यह कैसा सम्मोहन आकर्षण है ?  



पूजन गौरी  सखी ले आईं। 

करत प्रकाश बिरहि  पुरवाई 

तात जनक सन आवै सोइ.

लक्ष्मण मेरा शरीर तो यहां हैं लेकिन मेरा मन वहां हैं  जहां से आभूषणों की खनक रुनझुन की आवाज़ आ रही है। भक्ति के प्रति भगवान् का अनुराग नहीं होगा तो किसके प्रति होगा। जानकी जी भक्ति की प्रतीक हैं। लक्ष्मी जी की भी प्रतीक हैं। 

जानकी जी ने जब प्रभु का प्रथम दर्शन किया ,अपने नेत्र मूँद लिए ताकि भगवान निकल कर  चले न जायें । जानकी जी नेत्रों के कपाट मूँद लेती हैं।भक्ति भगवान् को पाकर उन्हें खोना नहीं चाहती। हम भगवान् का दर्शन इसलिए नहीं कर पाते ,भगवान् बेशक बड़े दयालु ,बड़े कृपालु भी हैं लेकिन ईर्ष्यालु भी बहुत हैं जब वह हृदय में हों तो कोई बाहर का दृश्य प्रवेश न करे ,इसीलिए भगवान् खुली आँख से निकलकर चले जाते हैं। 

जानकी जी ने जब देखा अरे ये तो इतने कोमल हैं इन्हें फूल की कली तोड़ते हुए भी पसीना आ रहा है। इतना भारी -भरकम शिव धनुष  कैसे तोड़ेंगे जिसे बड़े बड़े महाबली हिला भी न सकें ?ममता वश माँ को भी अपना बेटा सदा कमज़ोर ही नज़र आता है ऐसा ममता वश ही होता है। आशंका अतिशय प्रेम से प्रेरित होती है। आशंका का कोई आधार नहीं होता है अफवाह की तरह ,लेकिन ऊपर उठती जाती है अफवाह की तरह बिना पंख के पाखी सी। 

"धनुष कठोरता का प्रतीक था और अहंकारी को तोड़ने में मुझे ज़रा भी श्रम नहीं करना पड़ता लेकिन ये तो भक्ति की कलियाँ हैं इन्हें तोड़ने में मुझे  श्रम करना ही पड़ता है कोमल भावनाओं को कैसे तोड़ू मेरा हृदय काँप जाता है-राम तुलसीदास जी से कहते हैं  "

  -यही सवाल जो जानकी जी मन में सोच रहीं हैं  एक बार तुलसीदास जी ने भगवान् से पूछा था भगवान् यह कैसी लीला है आपकी इतना भारी भरकम धनुष आप फूल की तरह उठा लेते हैं और फूलों की कलियाँ तोड़ते हुए आपके माथे पे पसीना छलक आता है। 

विनय प्रेम वश भइँ भवानी -

 हंसी माल मूरत मुस्कानी  . 

विनय की प्रतीक हैं जानकी  जी। गौरी के सामने पछाड़ खाकर गिर जातीं हैं। भवानी (गौरी )कहती हैं बेटी तुम्हारी विनय को  मैंने स्वीकार किया है तुम्हें  यही वर मिलेगा। 

सुफल मनोरथ होये तुम्हारी ,

रामलखन सुनी भये सुखारी। 

भगवान् ने  लक्ष्मण जी से पूछा ,तुम्हें आशीर्वाद कैसे दे दिया ,जानकी जी तो मुझे मिलेंगी ,बोले लक्ष्मण जी भैया तुम तो जानकी जी में डूबे थे जानकी जी की उन आठ सखियों में उर्मिला भी थीं मैंने उन्हें और उन्होंने मुझे भी देख लिया था इसीलिए भवानी का आशीर्वाद मुझे भी मिला है। 

आज का सूर्योदय जानकी जी का भाग्य लेकर आरम्भ हो रहा है।

जिनके रही भावना जैसी ,

प्रभु मूरत तिन देखिन जैसी  . 

जिसकी जैसी भावना थी  भगवान्  उनको उसी रूप में दिखाई दे रहे हैं । दुष्टों को महाकाल ,भक्तों को महावीर लग रहे थे।वत्सल माँ को बड़े कोमल ...  

सुभग श्रृंगार ...किशोरी जी धीरे -धीरे मंडप में प्रवेश कर रहीं हैं सारा मंडप भक्ति की सुगंध से भर जाता है। 

धीरे चलो सुकुमार सुकुमार सिया प्यारी .....  

जगत जननी अकुलित छवि भारी ..... 

धीरे चलो सुकुमार सुकुमार पीया प्यारी .... 

..... 

 देश विदेश के राजा आये ,कर करके नाना श्रृंगार 

श्रृंगार सिया प्यारी ,धीरे चलो सुकुमार ,सुकुमार सिया प्यारी। 

भक्ति की गति धीरे धीरे चलो ,धीरे -धीरे ही भक्ति आगे बढ़ती है। भजन भी  धीरे -धीरे बढ़ता है ,भक्ति बहुत सुकुमारी होती है भक्ति लता की प्रतीक है ,वृक्ष ज्ञान के प्रतीक होते हैं। लता को  उठने के लिए गुरु का सहारा चाहिए। बिना गुरु सहारे के लता वेळ वल्लरी ऊपर चढ़ ही नहीं सकती बहुत सुकुमार होती है वेळ ज्यादा पानी लगा दिया तो लता गल जाती है कम मिलने पर सूख जाती है ।वासना के कांटे न आ जाएँ, सालों साल का भजन एक पल में नष्ट हो जाता है इसलिए बहुत संभाल के चलो।वासना ,काम की बाड़ चारों ओर से भक्ति को घेर लेती है।  

मेरी नाव चल रही गुरु के सहारे .....  

हम सब गुरु जी के ,गुरु जी हमारे। 

भक्ति में अंत समय तक गुरु का सहारा चाहिए लक्ष्य तक पहुँचते -पहुँचते नित्य सहारा चाहिए ,कभी भी विकार की आंधी आकर भजन को चौपट कर सकती है। इसलिए गुरु की आखिर तक लक्ष्य तक पहुँचने तक जरूरत रहती है। 

स्वयंवर की घोषणा के नियम नगाड़े के साथ पढ़े जाते हैं :

हे महाबलियों ,देश -विदेश के राजाओं ये जो धनुष आप शंकर जी का देख रहे हैं यह राहु के समान कठोर है और आप की भुजाओं की ताकत चन्द्रमा के समान है ,  अति - बलशाली है ,जो भी इस धनुष को तोड़ देगा जानकी जी निसंकोच उसके गले में वरमाला डाल देंगी ,इस बात पर विचार नहीं किया जाएगा के ये छोटी रियासत का मालिक है या बड़ी का। किस जाति और वर्ण का है करो प्रयास। 

यहां बड़ा भारी व्यंग्य है ,चन्द्रमा का अपना प्रकाश नहीं होता और फिर यह जनकपुरधरम शील नगरी है यहां अधर्म नहीं होता। यहां सब करम शील ग्यानी गुणवान ही रहते हैं सब श्रेष्ठ पुरुष निवास रहते हैं। 

अयोध्या भी संत महात्माओं की नगरी है लेकिन वहां भी एक दुष्ट है मंथरा और लंका में सब दुष्ट निवास करते हैं लेकिन वहां एक सद्पुरुष विभीषण भी  है। 

यहां तो जगत माँ बैठी है।सूर्य वंश का परम प्रकाश बैठा है और चन्द्रमा का प्रकाश तो उधार लिया होता है और तुम्हारी भुजाओं में चंद्र की ही ताकत है।  

तुम यहां बैठे हो तुम्हें शर्म नहीं आती क्योंकि चन्द्रमा सागर का बेटा है और लक्ष्मी जी सागर की बेटी हैं ,जानकी जी भी लक्ष्मीजी  की ही प्रतीक हैं।

यहां जनकपुर में तो  तो नौकर भी गुणवान है जिसने ये वक्रोक्ति पढ़के सुनाई है वह ढिंढोरची भी गुणी है ,जिसने घोषणा सुनाई है । इसका अर्थ हुआ चन्द्रमा जी और लक्ष्मी जी बहिन भाई हैं  ,तुम बहन से विवाह करने आये हो।तुमको शर्म नहीं आई। जानकी जी के हाथ में तो तुम्हारी राखी होनी चाहिए थी तुम उनके संग पाणिग्रहण करने आये हो। 

लेकिन मूढ़ता के कारण इन मंद -मति राजाओं  को ये गूढ़ भाषा समझ ही नहीं आई। 

कुछ भोले भाले राजा भी आये थे जिन्हें पता था सूर्यवंशी राम ही धनुष तोड़ेंगे ,ये सब भगवान् की लीला देखने आये थे। 

कुछ राजा बोले हम को यहां आकर पता चला जानकी जी धरतीकी बेटी हैं और हम धरती के मालिक भूपति  हैं , तो जानकी जी हमारी बेटी हुईं अब हम कन्या दान देकर  कन्या दान के बाद ही  जाएंगे। 

लेकिन कुछ मूर्ख राजा अपनी ज़िद पर अड़े हुए हैं। अपने -अपने इष्टों को प्रणाम करते हैं  -हे  ईष्ट देव ये धनुष मुझसे तुड़वा देना ,मुझसे न टूटे तो कोई और भी न तोड़ सके। समाज की आज यही स्थिति है,मैं कोई अच्छा काम न कर सकूं तो दूसरा भी क्यों करे मैं कमसे कम ऐसी व्यवस्था तो करूँ। 

दस हज़ार राजा उठे धनुष उठाने के लिए (वास्तव में वे धनुष को दबोच  रहे थे नीचे की ओर ताकि कोई और भी धनुष न उठा सके  ). आखिर में सब राजा शांत होकर बैठ गए हताश होकर। 

भक्ति की  ओर सकाम भाव से मन में कोई आशा लेकर देखोगे तो  भक्ति तुम्हारी और देखेगी भी नहीं। आशा एक राम जी से रखो ,दूसरा न कोई जिससे आस रखो। 

जनक जी मंच पर आये -घोषणा की अगर मुझे पता होता परशुराम ने धरती को वीरों से शून्य कर दिया है तो मैं ऐसी कठोर शर्त न रखता। राजा लोग अभी भी बैठे हैं। जनक जी फिर मंच पर आ गए। जनक जी फिर बोले आशा त्यागो अपने अपने घर जाओ अब क्यों बैठे हो। राजा हल्ला करने लगे क्यों चले जाए क्या हो गया। जनक जी बोले -

तजहुँ आस निज निज घर जावु , 
लिखा न विधि  वैदेही विवाहु ...   

बोलते बोलते जनक जी रो पड़े ...ये एक ग्यानी नहीं एक बाप रोया था के मेरी बेटी अब कुवारी ही रह जायगी क्या ? 

रोते -रोते भी वेदांत बोला -अपने अपने घर जाओ जाकर सोचो आप भक्ति के योग्य भी हो  या नहीं । आशा लेकर भजन करोगे तो भक्ति तुम्हारी ओर देखेगी   भी नहीं। भक्ति फलीभूत नहीं होगी।भजन आगे नहीं बढ़ेगा।  

वीर विहीन महि मैं  जानी ...

जैसे ही लक्ष्मण जी ने जनक जी के मुख से ये सुना लक्ष्मण जी आवेश में खड़े हो गए -बोले भगवान् क्षमा कर देना -जहां आप बैठे हों वहां कोई ये कहे ये धरती वीरों से विहीन हो गई ये मैं सह नहीं सकता -आज तक मैं आपके सामने कभी बोला नहीं  हूँ  ,आज बोल रहा हूँ और जनक जी को इंगित करके बोले यदि धनुष तोड़ना ही वीरता है तो मैं इसे पल भर में ही वैसे तोड़ दूँ जैसे हाथी अपनी सूंड से कमल नाल को तोड़ देता है ,मैं चाहूँ तो सारे ब्रह्माण्ड को उठाकर एक हज़ार  योजन दौड़ जाऊँ ,कच्चे घड़े के समान फोड़ दूँ  और यदि ऐसा न कर सकूं तो सुमित्रा का  पुत्र न कहाऊँ।

क्योंकि आप ने यह सब कहा है इसलिए मैं चुप हूँ कोई और होता तोअब तक गर्दन धड़  सेअलग कर देता। धरती कांपने लगी। लक्ष्मण  जी भगवान् की तरफ देखतें हैं ,वे मंद -मंद मुस्कुरा रहें हैं मानो कह रहे हों बहुत अच्छा किया तुमने ,सही निभाया अपना रोल मौके पर सही बात कहकर -

सूर्य प्रकट होने से पहले लालिमा प्रकट होती है ,लालिमा प्रकट तूने कर दी प्रकाश मैं  कर दूंगा। महाकाल की गर्जना तूने कर दी ,कृपा मैं कर दूंगा। 

राम  बिना गुरु आज्ञा के कुछ नहीं करते बुरा उन्हें भी  लगा है।लेकिन भगवान को भी गुरु की आज्ञा लेनी ही पड़ती है कुछ करने से पूर्व ,इसीलिए भगवान् अभी तक खामोश बैठे थे।  

अब विश्वामित्र को अपनी गलती महसूस हुई -बोले राघव उठो  धनुष भंजन कर जनक का ताप हरो। जानकी जी मन ही मन अकुला रहीं हैं और एक बार आँखों से संकेत कर दिया भगवान धरती की बेटी धरती में ही समा जाएगी अगर धनुष न उठाया तो ,भगवान् ने जानकी जी की आँखों में आंसू देखे ,भगवान् "भक्ति "की आँखों में आंसू नहीं देख सकते। भक्ति के आंसू में भगवान् को पिघलाने की ताकत है। भगवान् आकुल हो गए -भगवान् ने धनुष की तीन परिक्रमाएं की ,जानकी जी और सुनैना को मन ही मन प्रणाम किया ,शिव पार्वती को प्रणाम किया ,गणेश जी को प्रणाम किया ,गुरुवार को प्रणाम किया और उन्होंने धनुष को फूल की तरह उठाकर प्रत्यंचा खींच दी। 

इससे ठीक पहले लक्ष्मण जी खड़े हो गये थे ,क्योंकि धनुष के टूटने से भारी टंकार होगी वह जानते थे धरती काँप  जाएगी ,इसीलिए उन्होंने सारे प्रजापतियों और दिक्पालों को सावधान कर दिया ,धरती को संभाल जबड़ों से संभाल कर रखें ,धरती  काँपती  तो रघुवर के विवाह में विलम्ब पैदा  होता ,ऐसा कुछ न हो  जाए इसीलिए लक्ष्मण जी इससे पहले के भगवान् धनुष तोड़ें खड़े हो गए थे। 

प्रभु  दोउ  चाप खंड महि डारे ,

देखि लोग सब भये सुखारे। 

सखियाँ वरमाला के साथ जानकी जी  को भगवान् के सामने खड़ा करती हैं ,जानकी जी वरमाला डाल नहीं पा रहीं हैं। जानकी जी जानकर  के देर कर रहीं हैं  सोचते हुए जब आपने धनुष तोड़ने में इतनी देर की तो मैं जोड़ने में भी तो देर करूंगी। 

झुक जइयो लखन के तात  ,

किशोरी मेरी छोटी सी। 

लोग लुगाई गा रहे हैं....  

भगवान् लम्बे हैं किशोरी जी छोटी सी हैं ,भगवान् के गले तक उनके हाथ नहीं पहुँचते ,लक्ष्मण जी की ओर  देख कर संकेत करती हैं ,धरती को थोड़ा ऊपर उठा दो ताकि मेरे हाथ भगवान के गले तक पहुँच जाए ,लखन बोले भगवान् भी तो उतने ही ऊपर उठ जाएंगे वे भी तो उसी धरती पर खड़ें  हैं।

अंत में लक्ष्मण जी को एक युक्ति सूझी लखन भगवान के आगे दंडवत प्रणाम करने के लिए लेट गए ,भगवान जैसे ही उन्हें उठाने के लिए झुके जानकी जी ने वरमाला भगवान् के गले में डाल दी।  

देवर का मतलब ही यह होता है -दे वर ! 

सन्दर्भ -सामिग्री :Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 12 Part  2 ,3








   


  




   











कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें