मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

इसी इंद्रावी तंत्र के कुछ अवशेष और चंद कट्टर पंथियों की गोद में पोषण पाते हमारे रक्तरँगी लेफ्टिए आज मोदी को फूंटी आँख नहीं देख पा रहे हैं। जानते हैं किसलिए : वह इसलिए अब सूरज नियमानुसार उदित हो रहा है किसी का पालतू नहीं है

बहुत  नहीं सिर्फ  चार कौवे थे काले ,उन्होंने ये तय किया कि सारे उड़ने वाले ,

उनके ढंग से उड़ें ,रुकें ,खाएं और गायें ,वे जिसको  त्यौहार कहें सब उसे मनायें  .

कभी -कभी जादू हो जाता  दुनिया में ,दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया  में ,

ये औगुनिये चार बड़े सरताज हो गये  ,इनके नौकर चील गरुण और बाज़ हो गए।

हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में ,हाथ बाँध कर खड़े हो गए सब विनती में ,

हुक्म हुआ चातक पंछी रट  नहीं लगाएं ,पिऊ -पिऊ को छोड़ कांव -कांव ही गाएँ।

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को ,खाना पीना मौज़ उड़ाना छुटभैयों को ,

कौओं की ऐसी बन आई पाँचों घी में ,बड़े बड़े मनसूबे आये उनके जी में।

उड़ने तक के नियम बदल कर  ऐसे ढाले ,उड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले।

आगे क्या हुआ सुनाना बहुत कठिन है ,यह दिन कवि  का नहीं चार कौओं का दिन है ,

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना ,लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह  सुनाना।

                          -----------------------  (भवानी प्रसाद मिश्र )

कविता -संग्रह ' जी हाँ मैं गीत बेचता हूँ किस्म -किस्म के गीत बेचता हूँ। ' से साभार।

                               ----------------------------------(भवानी प्रसाद मिश्र )
प्रस्तुति :वीरेंद्र शर्मा (वीरु भाई )

भावसार :भवानी भाई की ये कविता आपातकाल में तब लिखी गई थी जब इस देश की तमाम संविधानिक व्यवस्थाओं  के ऊपर एक इंद्रा -जी  पालती मारकर  बैठ गईं थीं।महज़ अपनी कुर्सी बचाने के लिए इलाहाबाद उच्चन्यायालय के फैसले को धता बताते हुए तब उन्होंने जो सन्देश दिया था भारत के जन-मन को उसका खुलासा यह कविता बेलाग होकर करती है। यह वह दौर था जब  तमाम छद्म मेधा उनकी हाँ में हाँ भयातुर होकर मिलाने लगी  थी। लेकिन उस दौर में भी दुष्यंत कुमार और भवानी दा जैसे लोग थे जिन्होंने अपनी अस्मिता को बचाके रखा था और ये कविता दागी थी उस समय की दुर्दशा से संतप्त होकर:

इंदिराजी इंद्रा -व्यवस्था की  मारफत यही सन्देश दे रही थीं कौवों की कांव -कांव ही संगीत होता है। संगीत -फंगीत इसके अलावा और कुछ नहीं होता।
गौरैयाओं को यही कहा था -तुम खाओ पीयो बस इतना बहुत है तुम्हारे लिए इस देश की चिंता तुम मत करना। सुप्रीम कोर्ट भी अब उसे ही दिन कहेगा जिसे हम दिन कहना चाहेंगे और कहते हैं।

ये वो लोग थे जो यह कहते समझते थे -जब हम पैदा हुए थे तभी से इस सृष्टि का निर्माण हुआ है । उस व्यववस्था के ध्वंश अवशेष आज भी अपने बेटे का नाम प्रभात रखके ये समझते हैं हमने सूरज को पाल लिया है। वह भी तभी निकलेगा जब हम चाहेंगे।

इसी इंद्रावी तंत्र के कुछ अवशेष और चंद कट्टर पंथियों की गोद  में पोषण पाते हमारे रक्तरँगी लेफ्टिए आज मोदी को फूंटी आँख नहीं देख पा रहे हैं। जानते हैं किसलिए :

वह इसलिए अब सूरज नियमानुसार उदित हो रहा है किसी का पालतू नहीं है। 

बेशक शोध की खिड़की से जैविक -पक्षीय प्रो -बाइअटिक्स उल्लेखित मामलों में लाभदायक प्रतीत हुए हैं ,फिर भी अभी और अन्वेषण के बाद ही कुछ पुख्ता तौर पर कहा जा सकेगा। (१ )प्रतिजैविक (antibiotics )या जीवाणुनाशक दवाओं के पार्श्व प्रभाव के रूप में कुछ लोगों को होने वाले अतिसार (पानी सा पतला दस्त बिना लक्षणों का )के मामले में प्रो -बाइआटिक्स उपयोगी मालूम पड़ते हैं। (२ )इर्रिटेबिल बाउल सिंड्रोम के लक्षणों में राहत मिलती देखी गई है। (३ )आंत्र -संक्रमणों के कुछ मामलो में स्वास्थ्य लाभ में तेज़ी आ सकती है इनके स्तेमाल से। (४ )बारहा होने वाला सर्दी जुकाम एवं फ्ल्यू के मामलों की बारम्बारता (बारहमासा पसराव में राहत )में कमी। (५ )एलर्जी से पैदा चमड़ी के विकार कमतर रह सकते हैं। कुछ अन्य जीवन शैली रोगों में इनकी (दोनों प्रो और प्री -बाइआटिक्स की )कारगरता और निरापदता की पड़ताल की जा रही है इन रोगों में मधुमेह (डायबिटीज़ ),कैंसर और हृद -रोगों का नाम लिया जा सकता है। अ -वांच्छित या नया प्रभाव इन दोनों के ही तन्दुरस्त लोगों में दिखलाई नहीं दिए हैं अलबत्ता खाद्य या खुराकी सम्पूर्ण लेने से पहले आप अपने पारिवारिक चिकित्सक ,केयर -टेकर से ज़रूर पूछें

क्या हैं जैविक -पक्षीय जीवाणु -मित्र 'प्रोबाइाटिक्स 'एवं पूर्व -जैविक (प्री -बाइ -आ-टिक्स 

),खुराक में इनका होना ज़रूरी या गैर -ज़रूरी ?


सीधा -सच्चा -सादा  उत्तर है इस प्रश्न का -

भले ये सेहत -सहाय जीवाणु हों किन्हीं अर्थों में लेकिन ज़रूरी नहीं है इनका हमारी खुराक में जगह बनाये रहना। आजकल खासी सुगबुगाहट है इन्हें लेकर दवा निगमों और सम्पूरक निर्माता निगमों में। बीच में अमरीकी खाद्य एवं दवा संस्था एफडीए भी कूदती दिखी है। मामला व्यावसायिक हितों के संरक्षण का ज्यादा दिखता है बहरसूरत इस मामले में हम निर्णायक की भूमिका में नहीं आ सकते। 

दीगर है ये सूक्ष्म -जीव (सूक्ष्म -जैवावयिक संगठन )या ऑर्गेनिज़्म पाचन को कुछ मामलों यथा कब्ज़ियत (कॉन्स्टिपेशन )में टेका लगाए दिख सकतीं हों। कुछ हानिकारक जीवाणुओं के खिलाफ एक कवच बनतीं होवें। आखिर दोनों किस्म के जीवाणुओं का डेरा रहता है  हमारे शरीर में। इनमें से मित्र -जीवाणु पहले ही यह भूमिका अदा कर रहें हैं। 

पूर्व -जैविक या प्री -बाइआटिक्स वास्तव में अपाच्य कार्बोहाइड्रेट होते हैं। यह प्रो -बाइाटिक्स की  खुराक बनते हैं। दोनों में एक प्रकार का सहजीवन परस्पर संवर्धन पोषण देखा जाता है एक प्रकार का लिविंग -इन -रिलेशन कह सकते हैं आप इसको। 

किण्वित खाद्य सामिग्री खासकर दुग्ध उत्पाद (डैरी -प्रॉडक्ट )दही (मिष्ठी  दही या योगर्ट ),'केफिर' (कम चिकनाई वाला  रशियन दही ),इनके घाल -मेल वाले उदाहरण कहे जा सकते हैं। यानी प्रो- ,और प्री - ,दोनों के यौगिकों का यहां संग -साथ रहता है जिसे पोषण विज्ञानियों ने एक नया नाम दिया है -सिंबॉयटिक (Synbiotic ).इन खाद्यों में लाइव बैक्टीरिआ और उनका ईंधन (फ़ूड )मौजूद रहता है।  

प्रो -बाइटिक्स के स्रोत के रूप में दही और sauerkraut(सौएर्क्रौट ,जेरुसलम आर्टिचोक या हाथीचाक )का नाम लिया जा सकता है मोटे अनाज ,केला ,लहसुन -प्याज ,सोयाबीन और एंटिचोक्स जैसे खाद्यों को प्री-बाइ -आ - टिक्स में रखा जाएगा। 
ये दोनों ही खुराकी सम्पूरकों(डाइअट्री -सप्लीमेंट्स ) में भी आपको मिलेंगे। 


देखें सेतु :

Kefir is a fermented milk product similar to yogurt, which originated in Russia. This tangy, creamy milk product is sometimes referred to as the “champagne of milk” because of its fizzy effervescence. The natural carbonation gives kefir a light, foamy, creamy texture, even when made with low-fat milk. 

बेशक शोध की खिड़की से  जैविक -पक्षीय प्रो -बाइअटिक्स उल्लेखित मामलों में लाभदायक प्रतीत हुए हैं ,फिर भी अभी और अन्वेषण के बाद ही कुछ पुख्ता तौर पर कहा जा सकेगा। 

(१ )प्रतिजैविक (antibiotics )या जीवाणुनाशक दवाओं के पार्श्व प्रभाव के रूप में कुछ लोगों को होने वाले  अतिसार (पानी सा पतला दस्त बिना लक्षणों का )के मामले में प्रो -बाइआटिक्स उपयोगी मालूम पड़ते हैं। 

(२ )इर्रिटेबिल बाउल सिंड्रोम के लक्षणों में राहत मिलती देखी  गई है। 

(३ )आंत्र -संक्रमणों के कुछ  मामलो  में स्वास्थ्य लाभ में तेज़ी आ सकती है इनके स्तेमाल से। 

(४ )बारहा होने वाला सर्दी जुकाम एवं फ्ल्यू के मामलों की बारम्बारता (बारहमासा पसराव में राहत  )में कमी। 

(५ )एलर्जी से पैदा चमड़ी के विकार कमतर रह सकते हैं। 

कुछ अन्य जीवन शैली रोगों में इनकी (दोनों प्रो और प्री -बाइआटिक्स की )कारगरता और निरापदता की पड़ताल की जा रही है इन रोगों में मधुमेह (डायबिटीज़ ),कैंसर और हृद -रोगों  का नाम लिया जा सकता है। 
अ -वांच्छित या नया प्रभाव इन दोनों के ही तन्दुरस्त लोगों में दिखलाई नहीं दिए हैं अलबत्ता खाद्य या खुराकी सम्पूर्ण लेने से पहले आप अपने पारिवारिक चिकित्सक ,केयर -टेकर से ज़रूर पूँछें। 

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )Reference :https://www.blogger.com/blogger.g?blogID=232721397822804248#editor/target=post;postID=6046058053860176349https://www.blogger.com/blogger.g?blo

अंग्रेजी भाषा में सहज महसूस करने वालों के लिए मूल पाठ आंग्ल भाषा में भी दिया जा रहा है ,कृपया पढ़ें :


Do I need to include probiotics and prebiotics in my diet?


You don't necessarily need probiotics — a type of "good" bacteria — to be healthy. However, these microorganisms might help with digestion and offer protection from harmful bacteria, just as the existing "good" bacteria in your body already do.
Prebiotics are nondigestible carbohydrates that act as food for probiotics. When probiotics and prebiotics are combined, they interact beneficially (symbiotic relationship). Fermented dairy products, such as yogurt and kefir, are considered synbiotic because they contain live bacteria and the fuel they need to thrive.
Probiotics are in foods such as yogurt and sauerkraut; prebiotics are in whole grains, bananas, onions, garlic, soybeans and artichokes. In addition, probiotics and prebiotics are added to some foods and available as dietary supplements.
Although more research is needed, there's evidence that probiotics might help:

  • Treat diarrhea, especially after taking certain antibiotics
  • Treat irritable bowel syndrome
  • Speed treatment of certain intestinal infections
  • Prevent or reduce the severity of colds and flu
  • Ease allergic disorders such as eczema and hay fever
Probiotics and prebiotics are also being studied for effectiveness and safety in other diseases, such as diabetes, cancer and heart disease.
Side effects are rare, and most healthy adults can safely add foods that contain prebiotics and probiotics to their diets. If you're considering taking supplements, check with your doctor to be sure they're right for you.
Reference :

(१ )https://www.blogger.com/blogger.g?blogID=232721397822804248#editor/target=post;postID=6046058053860176349https://www.blogger.com/blogger.g?blo

(२ )ttps://www.google.com/search?q=artichokes+fruit+in+hindi&rlz=1CAACAP_enUS646US647&oq=antichokes+hindi+&aqs=chrome.2.69i57j0l


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रविवार, 15 अक्तूबर 2017

ज्ञान की अति रावण को बर्बाद कर गई थी। आज नौनिहालों को इंटरनेट की अति से भी बचाने की जरूरत है। आज बच्चा पैदा होते ही उस नर्स को घूरने लगता है जो कान से मोबाइल लगाए हुए है। नर्स कहती है विस्मय से क्यों रे छुटके क्यों घूर रहा है मुझको।ज़वाब मिलता है ज़रा अपना मोबाइल दीजिए -भगवान् को एसएमएस करना है मैं ठीक ठाक पहुँच गया

शिखर से शून्य तक की यात्रा 

मरणासन्न रावण लक्ष्मण  के प्रश्नों का उत्तर देते हुए  सीख देता है :

(१)इच्छाओं की पूर्ती से इच्छाओं का अंत नहीं होता ,इच्छाएं और बढ़ जाती हैं ,इच्छाओं का रूपांतरण करना पड़ता है मैं यहीं चूक गया। 

(२)शुभ काम के करने में कभी देरी नहीं करनी चाहिए और अशुभ के करने में जल्दी। 

(३ )अपने शत्रु की क्षमताओं को कभी भी अपने से कम आंक के नहीं देखना ये मेरी तीसरी भूल थी मैं इसी गुमान में रहा एक वनवासी वानर ,एक मनुष्य मेरा क्या मुकाबला करेगा। यह रावण की लक्ष्मण  को तीसरी सीख थी। 

(४ )कभी अपने जीवन की गुप्त बातों को किसी के सामने प्रकट न करना मैंने एक बार यह गलती की थी विभीषण को अपनी मृत्यु का राज बतला दिया था ,जिसका खामियाज़ा अब मैं भुगत रहा हूँ। 

'हम काहू के मरहि न मारे ,
वानर मनुज जाति दुइ मारे। '-यही वर माँगा था रावण ने शिवजी से ,ब्रह्मा जी से ,रावण तप और तपस्या दोनों के फलितार्थ का दुरूपयोग करता है। 
रावण नीति थी संस्कृति को नष्ट करना सरस्वती को हासिल करके। मेधा के दुरुपयोग  की शुरुआत ही रावण नीति थी।हमारे लेफ्टिए इसका साक्षात प्रमाण हैं।  

रावण ने  पहले तप करके अनेक वरदान अर्जित किये ,फिर उनका गलत प्रयोग करके शाप कमाए। 

जो खुद रोये और दूसरों को भी रुलाये वही रावण है। 'राव' से रावण। 

जो अपनी पुत्र -वधु को न  छोड़े उसका नाम रावण है। 

नल कुबेर का शाप था जिसकी वजह से  रावण ने  सीता के अपहरण  के बाद उनका स्पर्श नहीं किया।पर नारी का उसकी  सहमति के बिना उसका मस्तिष्क सौ टुकड़ा हो जाता।  
जो अपनी बहन को विधवा बना दे उसका नाम रावण है। 

महत्वकांक्षी रावण का कोई सम्बन्धी नहीं होता। बस एक महत्वकाँक्षा की आपूर्ति ही उसका लक्ष्य होता है। रिश्ते उसके लिए बोझ थे जिनका उसने बहुत दुरूपयोग किया।यहां तक की पार्वती को हासिल करने की उसने कुचेष्टा की।  
सेटिंग और दलाली ही रावण वृत्ति है रावण की सौगातें हैं। संतानें हैं। बलवान दिखे तो उससे माफ़ी मांग लो कमज़ोर दिखे तो उसे जीत लो। यही रावण वृत्ति थी।बाली उसे छ:  तक अपनी कांख में दबाये रहा। उससे माफ़ी मांग बाहर आकर डींग हांकने लगा।  
दो कुंठाएं भी थीं रावण की -कोई भी सुन्दर स्त्री उस पर मोहित नहीं होती थी। बस वह उठाकर ज़रूर ले आता था सौंदर्य को। दस सिर वाला काला-कलूटा रावण - सौंदर्य उसका क्या करे। 
रावण भीड़ का नेता था। भगवान्  समूह बनाते हैं। भीड़ के कोई सिद्धांत नहीं होते ,भीड़ का कोई चेहरा भी नहीं होता। राम समूह बनाते हैं वह भी स्थानीय तौर पर उपलब्ध मानव संशाधनों का। 

मानस की यह सीख है :प्रकृति और परमात्मा का कभी अपमान नहीं करना ,हम आज अशांत इसीलिए हैं भगवान् की जो प्रकृति अभिव्यक्ति है,भगवान् की जो शक्ल है  उसी प्रकृति  के साथ हम खिलावड़ कर रहें हैं। कहीं पेड़ काट रहें  हैं कहीं खदानों को डाइनेमाइट लगाकर उड़ाते हैं।

राम भगवान् हैं ,सीता जी भक्ति हैं ,भक्त हनुमान हैं। 

सीताजी शान्ति का भी प्रतीक हैं। 
रावण शान्ति भंग करता है। 
राम संस्कृति की रक्षा के लिए आये थे एक सीता को रावण से मुक्त कराने के माध्यम से वह सारे संसार की  पीड़ित महिलाओं के अनुरक्षण के लिए आये थे -जब -जब भी किसी महिला का अपहरण होगा राम आयेंगे।
आज जहां -जहां वैष्णव तरीके से जीने वाले पति -पत्नी में तनाव है ,वहां उसकी वजहें आपसी समझ का अभाव है क्योंकि पढ़े लिखे लोगों के बीच में विमत का रहना लाज़िमी है और इसमें बुरा भी कुछ नहीं है ,अब परिवार चलेगा तो समझ से ही चलेगा। एक दूसरे की कमज़ोरियों के प्रति सहनशील होने से ही चलेगा। आज विवाह दो पॅकेजिज़ दो बैलेंसशीट्स के बीच गिरह गांठ है। विवाहेतर संबंध भी सामने आ रहे हैं दोनों के ,पति के भी पत्नी के भी। अरूप रावण दोनों में विद्यमान है। 

हालांकि घर में पैसा इफरात से है लेकिन सुख शान्ति नहीं है। समाधान क्या है ?

समाधान :अन्न का नियंत्रण अन्नपूर्णा को अपने हाथ में लेना पड़ेगा। खाना अपने हाथ का बनाके खिलाना पड़ेगा पति को। मन में प्रेम भाव रखते हुए पकाना पड़ेगा। इस अन्न से ही एक प्रेम संसिक्त मन बनेगा। 
रावण ने घरों के अन्न पर भी प्रहार किया है (प्रहार किया था )-खाना तो घर का बना खाइये भले आप के पास प्रतिमाह लाखों के पैकिज़िज़ हैं। 

हनुमान (भक्ति )यदि आपके हृदय में है तो आप अंदर के अरूप रावण से जीत जायेंगे,यकीन मानिये। 
जीवन प्रबंधन की दीक्षा है रामचरित मानस में ,हनुमान चालीसा में जिसका पाठ तीन से पांच मिनिट में संपन्न हो जाता है। हनुमान समस्याओं के समाधान के हनू -मान हैं। असंभव को सम्भव बनाते हैं हनुमान। हनुमान चालीसा के तीरों से मारा जाएगा अरूप रावण। 
जीवन एक नियम का नाम है परिवार के नियम ,समाज के नियम ,जो इन नियमों को तोड़ता है वह रावण तत्व का पोषण करता है। रावण अपनी योग्यता का दुरूपयोग करता है। मातृशक्ति का अपमान करता है। 
अच्छाई जहां कहीं भी हो स्वीकार कर लेना अपना लेना । बुराई अपनी जब भी दिखे स्वीकार कर लेना। हम रावण से अपने बचपन, जवानी और बुढ़ापे को बचाएं। 

ज्ञान की अति रावण को बर्बाद कर गई थी। आज नौनिहालों को इंटरनेट की अति से भी बचाने की जरूरत है। 

आज बच्चा पैदा होते ही उस नर्स को घूरने  लगता है जो कान से मोबाइल लगाए हुए है।  नर्स कहती है विस्मय से क्यों रे छुटके क्यों घूर रहा है मुझको।ज़वाब मिलता है ज़रा अपना मोबाइल दीजिए -भगवान्  को एसएमएस करना है मैं ठीक ठाक पहुँच गया।  
सन्दर्भ -सामिग्री :

https://www.youtube.com/watch?v=Js0B_JpEAgQ

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

इन दिनों ये हालत है इंडिआ की :कहीं आंधी अंधड़ से भी किसी घौंसले से कोई चिड़िया का अंडा गिरके टूट जाए ,कुछ सेकुलर किस्म के प्राणि कहने लगते हैं ,इसके पीछे अमितशाह और मोदी का हाथ है।

इन दिनों ये हालत है इंडिआ की 

(१ )कहीं से किसी इमारत की कोई ईंट दरक जाए ,वहां से पांच मोदी बेटर्स- निकलते हैं। 

(२ )कहीं आंधी अंधड़ से भी किसी घौंसले से कोई चिड़िया का अंडा गिरके टूट जाए ,कुछ सेकुलर किस्म के प्राणि कहने लगते हैं ,इसके पीछे अमितशाह और मोदी का हाथ है। 
(३ )'सरकार ने जीना हराम कर दिया है' -एक साहब बुदबुदा रहे थे मेरे दफ्तर को लिखकर सरकार को मेरी उठ -बैठ संबंधी आरटीआई मांगने की क्यों जरूरत है ?मैंने सरकार का क्या बिगाड़ा है ?इन्हें लगता है सरकार इनके पीछे पड़ी है ,इन्हें कोई बड़ी सज़ा होने वाली है। कई तो मेरे घर -दफ्तर के लोग भी इस षड्यंत्र में शामिल दीखते है। 

 अपने आप को बड़ा महान आदमी मान ने लगें हैं ये साहब ,अपने महान होने का भरम फीलिंग आफ ग्रान्डियासिटी पाले बैठे हैं ये ज़नाब । इन्हें नहीं मालूम यह 'शिजोफ्रेनिक- बिहेवियर 'और 'बाइपोलर -इलनेस' की उत्तेजन वाली अवस्था का एक ख़ास लक्षण है। लिटमस पेपर टेस्ट है।
(४ )इधर एक शहज़ादा अखिल भारतीय  देवदर्शन यात्रा पर निकल चुका है एक दिन में पांच- पांच  मंदिरों में भगवान् के आगे जाकर इस सरकार का रोना रो रहा है। 
(५ )पूर्व में इनके कई पालतू पाकिस्तान जाकर यही रोना रो आये थे। मोदी हटाओ हमें लाओ। 
https://www.youtube.com/watch?v=2RzdnlVzAgA

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

जहां सुमति तहाँ संपत (संपति ) नाना , जहां कुमति तहाँ विपत निदाना .

जहां सुमति तहाँ संपत (संपति ) नाना ,

जहां कुमति तहाँ विपत निदाना  . 

शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया डॉक्टर सतीश त्यागी जी 

आपने हमें  प्रस्तुत पोस्ट का कच्चा माल पकड़ा दिया।

बिलकुल सही निष्कर्ष निकाला है चेताया है इस मंदमति को -

"ये जीजू को मरवाएगा" 

इसमें एक कमज़ोरी अंग्रेजी भाषा की भी रही है -'जहां ब्रदर -इन -ला 'संज्ञा और सम्बोधन दोनों से ही यह पता नहीं

चलता कि जीजा कौन है और साला कौन है। इसलिए हिंदी भाषा ने -तमाम जीजाओं ने -बड़ी चालाकी से सालिग्राम

(साले साहिब अर्थात )

'आधे- मालिक' हमारे ये भी हैं कहकर तमाम सालों का परिचय करवाना कब का शुरू कर दिया था। ).हिंदी भाषा में कई

जगह ध्वनित अर्थ साले का गाली भी निकाला जाता है। खासकर जब हम किसी को चुनौती देते हुए देख लेने की धमक

देते हैं -कहते हुए साले तुझे तो देख लूंगा।

अब इस वंशीय राजकुमार के यहां तो परम्परा से संबंधों का मतलब जैविक -संबंध ही रहा है। इसीलिए एक मर्तबा इनकी

बहिना के लिए अपने एक सम्बोधन में  नरेंद्र मोदी ने  कहा -वह तो मेरी बेटी समान है ,बेटी ही है तो अगले दिन इनका

रिजॉइंडर चला आया -मेरे पिताजी तो राजीव गांधी थे मैं किसी की बेटी फेटी नहीं हूँ।

यहां ज़नाब सतीश त्यागी जी 

रागात्मक संबंधों के लिए गुंजाइश ही नहीं है। 

राहुल अपनी कुशाग्र -बुद्धि से जानते हैं 'साला' एक गाली है। इसीलिए हो सकता है वह अपने को वाड्रा का साला मानने

में  हीनता  अनुभव करते हों।

बहरसूरत सब जानते हैं कांग्रेस ने अमित शाह को गुजरात में कितना तंग किया था ,कैसे -कैसे आरोप पत्र मढ़े -गढ़े  थे। अमित शाह तो साफ़ बच गए क्योंकि उनके खिलाफ कुछ प्रमाणित न हो सका।

 लेकिन वाड्रा मारा जाएगा ,उसके ठंडे बस्ते में पड़े मामले में अब तेज़ी आएगी। 

अमित शाह के पुत्र के खिलाफ आरोप मढ़ने वाले भी अब बैकफुट पे आये दीख रहे हैं ,बचावी भूमिका में आ गए हैं "रेलवे मंत्री को उनका बचाव नहीं करना चाहिए था "कह रहें हैं।

हमारा मानना है ,जांच से जो सामने आये सो आये ,जांच चले खूब चले ,चिंता किसे है ,ये बात ये मंदमति समझ ले तो उचक -उचक बोलने से कमसे कम इस मामले में तो बाज़ आये। वरना इसका तो जो बिगड़ेगा सो बिगड़ेगा जीजू ज़रूर मारा जाएगा।


आखिर में एक शैर इस मंद मति के नाम (भगवान् इन्हें सुमति प्रदान करे ):

एक ग़ज़ल कुछ ऐसी हो ,

बिलकुल तेरे जैसी हो ,

मेरा चाहे जो भी हो,

 तेरी ऐसी -तैसी हो।  

तुलसीदास मानस में कहते हैं :

जहां सुमति तहाँ संपत (संपति ) नाना ,

जहां कुमति तहाँ विपत निदाना  . 

एक ग़ज़ल कुछ ऐसी हो , बिलकुल तेरे जैसी हो , मेरा चाहे जो भी हो, तेरी ऐसी -तैसी हो।

शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया डॉक्टर सतीश त्यागी जी 

आपने हमें  प्रस्तुत पोस्ट का कच्चा माल पकड़ा दिया।

बिलकुल सही निष्कर्ष निकाला है चेताया है इस मंदमति को -

"ये जीजू को मरवाएगा" 

इसमें एक कमज़ोरी अंग्रेजी भाषा की भी रही है -'जहां ब्रदर -इन -ला 'संज्ञा और सम्बोधन दोनों से ही यह पता नहीं

चलता कि जीजा कौन है और साला कौन है। इसलिए हिंदी भाषा ने -तमाम जीजाओं ने -बड़ी चालाकी से सालिग्राम

(साले साहिब अर्थात )

'आधे- मालिक' हमारे ये भी हैं कहकर तमाम सालों का परिचय करवाना कब का शुरू कर दिया था। ).हिंदी भाषा में कई

जगह ध्वनित अर्थ साले का गाली भी निकाला जाता है। खासकर जब हम किसी को चुनौती देते हुए देख लेने की धमक

देते हैं -कहते हुए साले तुझे तो देख लूंगा।

अब इस वंशीय राजकुमार के यहां तो परम्परा से संबंधों का मतलब जैविक -संबंध ही रहा है। इसीलिए एक मर्तबा इनकी

बहिना के लिए अपने एक सम्बोधन में  नरेंद्र मोदी ने  कहा -वह तो मेरी बेटी समान है ,बेटी ही है तो अगले दिन इनका

रिजॉइंडर चला आया -मेरे पिताजी तो राजीव गांधी थे मैं किसी की बेटी फेटी नहीं हूँ।

यहां ज़नाब सतीश त्यागी जी 

रागात्मक संबंधों के लिए गुंजाइश ही नहीं है। 

राहुल अपनी कुशाग्र -बुद्धि से जानते हैं 'साला' एक गाली है। इसीलिए हो सकता है वह अपने को वाड्रा का साला मानने

में  हीनता  अनुभव करते हों।

बहरसूरत सब जानते हैं कांग्रेस ने अमित शाह को गुजरात में कितना तंग किया था ,कैसे -कैसे आरोप पत्र मढ़े -गढ़े  थे। अमित शाह तो साफ़ बच गए क्योंकि उनके खिलाफ कुछ प्रमाणित न हो सका।

 लेकिन वाड्रा मारा जाएगा ,उसके ठंडे बस्ते में पड़े मामले में अब तेज़ी आएगी। 

अमित शाह के पुत्र के खिलाफ आरोप मढ़ने वाले भी अब बैकफुट पे आये दीख रहे हैं ,बचावी भूमिका में आ गए हैं "रेलवे मंत्री को उनका बचाव नहीं करना चाहिए था "कह रहें हैं।

हमारा मानना है ,जांच से जो सामने आये सो आये ,जांच चले खूब चले ,चिंता किसे है ,ये बात ये मंदमति समझ ले तो उचक -उचक बोलने से कमसे कम इस मामले में तो बाज़ आये। वरना इसका तो जो बिगड़ेगा सो बिगड़ेगा जीजू ज़रूर मारा जाएगा।


आखिर में एक शैर इस मंद मति के नाम (भगवान् इन्हें सुमति प्रदान करे ):

एक ग़ज़ल कुछ ऐसी हो ,

बिलकुल तेरे जैसी हो ,

मेरा चाहे जो भी हो,

 तेरी ऐसी -तैसी हो।   

न प्रारेण नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन| इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितो | | (कठोपनिषद ,द्वितीय अध्याय दूसरी वल्ली ,पांचवां श्लोक) भावसार :इस सृष्टि में ब्रह्म ही एकमात्र चेतन शक्ति है ,जो वनस्पति ,जीव -जंतु ,पशु -पक्षी व सभी मनुष्यों के जीवन का आधार और कारण है। इसी शक्ति से ये सभी जीवन पाते हैं ,वृद्धि करते हैं तथा क्रिया करते हैं। दूसरा तत्व जड़ है जिसकी सभी क्रियाएं इस चेतन तत्व के कारण ही होतीं हैं। (प्रकृति स्वयं जड़ है ,ब्रह्म की ही एक शक्ति -'माया शक्ति' है जिसका ब्रह्म से संयोग होने पर ही यह प्रकृति बनके प्रकटित होती है। ).

न प्रारेण नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन| 

इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितो | | (कठोपनिषद ,द्वितीय अध्याय दूसरी वल्ली ,पांचवां श्लोक)

भावसार :इस सृष्टि में ब्रह्म ही एकमात्र चेतन शक्ति है ,जो वनस्पति ,जीव -जंतु ,पशु -पक्षी व सभी मनुष्यों के जीवन का आधार और कारण है। इसी शक्ति से ये सभी जीवन पाते हैं ,वृद्धि करते हैं तथा क्रिया करते हैं।

दूसरा तत्व जड़ है जिसकी सभी क्रियाएं इस चेतन तत्व के कारण ही होतीं हैं। (प्रकृति स्वयं जड़ है ,ब्रह्म की ही एक शक्ति -'माया शक्ति' है जिसका ब्रह्म से संयोग होने पर ही यह प्रकृति बनके प्रकटित होती है। ).

मनुष्य के जीवन का आधार भी यही आत्मतत्व है। प्राण एवं अपान  भी इसी के आश्रय में अपनी क्रिया करते हैं। दूसरा तत्व जड़ है जो हमारा पंचभौतिक शरीर है।

जब यह आत्मतत्व शरीर से अलग हो जाता है तो प्राण भी अपनी क्रिया बंद कर देता है जिससे मनुष्य मर जाता है। लेकिन इस क्रिया में न जड़ (शरीर )मरता है न चेतन  आत्मा। बल्कि दोनों का संबंध विच्छेद हो जाता है। (आत्मा तो अजर -अमर -अविनाशी चेतन तत्व कहा गया है और यह पांच तत्वों का पुतला ऊर्जा का पुंजमात्र विखंडित होकर अपने मूल तत्वों -आकाश -वायु -अग्नि -जल -पृथ्वी में विलीन हो जाता है। ऊर्जा का संरक्षण हो जाता है।

आत्मा तो स्वयं: भू संरक्षित तत्व है ही।इसका 'होना 'इज़्नेस शाश्वत  है। जब इसे एक शरीर और उसके साथ एक सूक्ष्म शरीर चतुष्टय -मन -बुद्धि -चित्त-अहंकार मिल जाता है  यह जीव -आत्मा कहलाने लगता है जो आत्मा से अलग नहीं है।

समष्टि के स्तर पर इसे ही ब्रह्म (परमात्मा )कहा गया है। माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म ,माया से आच्छादित ब्रह्म को ही ईश्वर कहा गया  है।

जीवन का आधार यही आत्म चेतना है जो सभी प्राणियों के जीवन का आधार है। जड़ में चेतना का संसार इसी आत्मतत्व से होता है।  

https://www.youtube.com/watch?v=6dNAG38cveI