शनिवार, 25 नवंबर 2017

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 15 Part 1, 2

भक्ति सीखनी है तो संतों के पास जाना पड़ेगा 

सतसंग भी संक्रामक होता है ,शुभ भी संक्रामक होता है ,अशुभ भी। आज कथा से पूर्व हम मीरा जी का थोड़ी देर दर्शन करेंगे ,उनकी  चर्चा करेंगे।भक्तिमती  मीरा जी को किसी ने भक्ति की मानसरोवर कहा  है तो किसी ने - 

मीरा जी को भक्ति की गंगोत्री ,भाव की सागर कहा  है। किसी ने विरह का महासागर ,भक्ति प्राप्त करनी है तो संतों के पास जाना ही पड़ेगा। मीरा को गाया  जा सकता है ,नांचा जा सकता है,बखान नहीं किया जा सकता। 

 सिर्फ संतों से कृष्ण कथा सुन -सुन कर  मीरा कृष्ण की दीवानी हो गईं थीं । कृष्ण के प्रेम में मीरा बालवत  रोती और  बिलखती हैं । 

तुम्हें जो कहना है कहो मुझे जो करना है वह मैं  करूंगी। 

"लोग कहें मीरा भई बावरी ,

सास कहे कुलनाशी रे 

पग घुंघरू बाँध मीरा नांची रे "

-प्रेमियों को लोग बावरा ही कहते हैं।  

द्वापर  की एक गोपी होतीं हैं मीरा जी जब भगवान् कृष्ण का अवतार हुआ था लेकिन उस समय फूल ,पूरा खिल नहीं सका था।अधूरा रह गया था । जिस समय गोवर्धन लीला भगवान् ने की उस समय पूरा ब्रिज (ब्रज )मंडल गिरीराज जी में  आता है इनकी सास इनको जाने  नहीं देती।  कहती है मीरा -तुम घर की हिफाज़त करो।यहीं घर पर रहो। तुम वहां नहीं जाओगी।   

मीरा  के जन्म की कथा भी -बड़ी मार्मिक है जिसका उल्लेख ऊपर हुआ है। आगे की कथा इस प्रकार है। भगवान् ने इनकी विरह अग्नि देख स्वप्न में इनसे बात की ,मैं तुमसे वायदा करता हूँ तुम्हें पूरा अवसर दूंगा जो तुम चाहोगी वही होगा। 

"हाँ तुम नांच सकोगी रो सकोगी मुझे लेकर मेरे विरह में "-मीरा इसी भाव से वह चोला (शरीर )छोड़ देती हैं भगवान् के आश्वाशन के साथ । 

"प्रभु बंधन मुक्त जन्म देना" -कहते हुए 

-जहां मैं नांच सकूं आपके प्रेम में।आपके गीत  बिना लोक लाज के गा  सकूँ वहां जान देना । और मीरा जी ने यह कहते हुए प्राण छोड़ दिए इसी भाव को लिए। 

मेड़ता (जोधपुर )में इनका जन्म हो गया। कंटीले रेतीले प्रदेश (राजस्थान )में। एक बार  एक संत इनके घर  आये। भगवान् कृष्ण की एक सुंदर छोटी सी  प्रतिमा ये संत अपने साथ रखते थे।मीरा जी इनके कमरे में खेलते -खेलते आ गईं। तब इनकी उम्र केवल पांच बरस थी।मीरा की छोटी सी बेहद खूबसूरत श्याम की मूरत पर नज़र पड़ी। 

 बालिका मीरा ने ज़िद पकड़ ली ये मूर्ती मुझे दो मेरे श्याम की है। मीरा के अवचेतन मन से साढ़े चार हज़ार बरस की स्मृतियाँ निकल कर उनकी चेतना में तैरने लगीं।

संत ने वह गिरधर गोपाल की मूर्ती मात्र बाल हठ मानकर देने से साफ़ इंकार कर दिया और अपने निवास स्थान को लौट गए। इधर मीरा बालिका ने तीन रोज़ तक अन्न ग्रहण नहीं किया। रोती  बिलखती ही रही बालिका। चौथे दिन संत जी को स्वप्न में भगवान् ने आकर कहा। यह मूर्ती जिसकी है उसे दे दो। तुम्हारा संग साथ इस मूर्ती के  साथ  पूरा हुआ। तुम्हारा रोल पूरा हुआ इतना ही था। संत हड़बड़ाकर उठे और प्रात : की वेला का इंतज़ार करने लगे। 

पौ फटते ही मेंड़ता के लिए चल पड़े मीरा जी से क्षमा मांगी आशीर्वचन भी कहा -बेटी भजन हमने किया ,लेकिन फल तुम्हें प्राप्त हुआ। बीज हमने बोया लेकिन फूल तुम्हारे घर खिला। 

मीरा के बचपन की ही एक और घटना है जिसने बालिका मीरा के जीवन की दिशा ही बदल दी। एक बार एक बरात इनके घर के आगे से जा रही थी। दादी के साथ ये बरात देखने घर के दरवाज़े पर आ गईं। सहज भाव दादी से पूछने लगीं दादी मेरा ब्याह (विवाह )किससे होगा।दादी ने बालिका को बहकाते हुए कह दिया लाड़ में -तेरा विवाह इस घनश्याम से होगा जिसकी प्रतिमा तू सीने से लगाए घूमती है। 

अब मीरा की "प्रेमा- भाव" की भक्ति जागृत हुई मीरा सचमुच कृष्ण को अपना पति मानने बूझने लगीं ।मीरा का विवाह मेवाड़ के राणा भोजराज जी से हुआ (जिन्हें सिर्फ राणा जी भी कहा जाता था।  भांवरों के वक्त भी इन्होने भगवान् की मूर्ती अपने पास छिपाई हुई थी अपने सीने से लगाई हुई थी। 

राणा जी इनका बहुत आदर करते थे। जल्दी ही उन्हें पता चल गया यह कोई दिव्यअवतार हैं  इस लोक से इनका कोई लेना देना नहीं हैं।मीरा गाते गाते हवेली  से बाहर  निकल आतीं ,संतों में चलीं आतीं ,गाँव के मंदिर में कीर्तन करने लगतीं। यह सब कुछ सुसराल वालों को बड़ा अटपटा लगा। लेकिन भोजराज जी सब समझ गए थे। एक दिन उन्होंने मीरा जी से कहा -हम को भी भगवान् के दर्शन कराओ -मीरा जी कहने लगीं ऐसा हो तो सकता है लेकिन फिर हमारा आपका पति पत्नी का यह लौकिक सम्बन्ध समाप्त हो जाएगा। राणा जी सोचने लगे ये शरीर तो जाएगा  ही जाएगा, आज नहीं कल ,भगवान् के दर्शन कर लो और राणा जी ने हामी भर दी.

भगवान को राणा जी ने जैसे ही देखा शरीर छोड़ दिया। 


अब मीरा के ऊपर राणा विक्रम सिंह ने कहर बरपा -ये 
 जो बहुत ही क्रूर शासक थे और मीरा जी से बेहद खफा रहते थे तरह तरह से इन्हें सताने के लिए बाकी परिवारियों और अन्य कर्मियों से कहा। 

मीरा ने मौन व्रत ले लिया।      

रहिमन चुप घर बैठिये देख दिनन के फेर 


एक बार चरणामृत है कहकर पुजारियों की मिलीभगत से इन्हें विष का प्याला पीने के लिए दिया गया। मीरा जानतीं थी ये विष है लेकिन उन्होंने कहा घनश्याम आज इस रूप में इस प्याले में आ गए। और सचमुच उस कथित चरणामृत के प्याले में इन्हें कृष्ण का श्याम रूप उनके सांवले सलोने नेत्र दिखलाई दिए। 

जहर पीया मीरा ने यहां और वहां द्वारका में झाग कृष्ण के मुख से आने लगे। मीरा के पास जो श्याम सुंदर की मूर्ती थी वह थोड़ी और काली पड़  गई।मीरा ज़िंदा रहीं मरी नहीं। 

अब विक्रम सिंह ने नित्य नै नै युक्तियाँ सोचनी शुरू कीं । एक षड्यंत्र के तहत काला नाग (कोबरा )दिवाली की भेंट स्वरूप मीरा तक पहुंचाने का सोच लिया।  

भक्त को देख कर जहरीले जंतु  भी  अपना स्वभाव बदल लेते हैं। कोबरा भेंट किया गया था मीरा जी को राणा विक्रम द्वारा दिवाली पर छल छद्म से ,पूर्व में जहर का प्याला चरणामृत बतलाकार दिया गया था। मीरा फिर बच गईं।सांप संतों से कुछ नहीं कहते वे जानते हैं ये तो प्रेम के पात्र हैं। सांप छोटे बच्चे को भी कभी नहीं डसते।सर्प आदमी की तरह खतरनाक नहीं होते , शंकर जी इसी लिए भोले नाथ कहलाते हैं जिनके गले में सर्प मालाएं झूलतीं हैं ,जो हँसते -हँसते विषपान कर गए थे और अमृत देवताओं तक पहुंचा था।

 विष भी अमृत बन जाता है असाधारण पात्र में आकर। और अमृत भी विष बन जाता है विकार युक्त पात्र में आ कर ,यही मीरा जी के जीवन का सन्देश है।  

नींद आनी बंद हो गई मीरा जी को गिरधर के विरह में -

नींद नसानी होय मेरी ,

सखी री  मेरी नींद न सानी  हो। 

ज्यों चातक घन कू रटै ,

मछली  बिन पानी हो ,सखी री मेरी ,

सखी री मेरी नींद न सानी हो। 

अंतर- वेदन विरह की, पीड़ न जानी कोय ।

अंग अंग व्याकुल भई,  

दासी मीरा विरह की सुध बुध बिसरानी हो ,

सखी री मेरी नींद  न सानी हो। 

तीन दिन  से मीरा सोयी  नहीं हैं प्रेम - विरह की ज्वाला में ,सखी को अपनी व्याकुलता बतलाती हैं -अब उनको कोई गफलत नहीं है -सब कुछ स्पष्ट हो गया है नींद इन अर्थों में उड़ी  है। मीरा जाग गईं हैं। 

ये वेदना वह है जिससे जीवन में ज्ञान का जन्म होता है धर्म का जन्म   होता है वेद का जन्म होता है। वेद का मतलब ज्ञान ही तो होता है। 

दोनों सखियाँ बात कर रहीं थी। (वास्तव में मीरा कृष्ण की मूर्ती से अपने कक्ष में बातें करतीं थीं। किसी ने राणा विक्रम सिंह जी से शिकायत की राणा आधी रात को उठकर तलवार लेकर मीरा के कक्ष में आ गए -पूछा कौन पुरुष था तुम्हारे कक्ष  में ? 

मीरा ने कहा मैं किसी पुरुष से नहीं परमपुरुष से बात करती हूँ राणा जी क्रोध में थे ठाकुर जी को उठाया और झील में फेंक दिया। पीछे -पीछे मीरा ने भी झील में छलांग लगा दी कहते हैं इसके बाद मीरा जी और गिरधर गोपाल की वह मूरत ,दोनों मथुरा -वृन्दावन की यमुना में प्रकट हुए। साढ़े चार हज़ार वर्ष पुरानी लीलाएं मीरा को याद आने लगीं। ललिता जी (राधा जी की ख़ास सखी )सब कुछ पूछने लगीं -ये गोवर्धन तुम्हें याद है ये वंशीवट तुम्हें अभी भी  याद है  ,ये निधि वन तुम्हें याद है ? 

मीरा मन ही मन सोचने लगीं जब उन्हें सेवकों ने निधिवन में आने से रोका :

ब्रज में केवल एक पुरुष है कृष्ण -ये दूसरा कहाँ से आ गया जो मेरा प्रवेश निधि वन में रोक रहा है ?रूपगोस्वामी रहते थे उन दिनों निधि वन में, जिनका आदेश था निधिवन में  किसी महिला को प्रवेश न करने दिया जाए।

राणा ने यहां वृन्दावन में भी अपने लोगों को भेजकर  मीरा को बहुत सताया आखिर में मीरा वृन्दावन भी छोड़कर  द्वारिका चली गईं। इसी बीच विक्रम राणा की मृत्यु हो गई। 

अब राणा उदय सिंह जी ,जो पूजा पाठ की वृत्ति वाले महात्मा थे, और सबसे बड़े   भी थे लेकिन विक्रम सिंह के आगे उनकी एक नहीं चलती थी सब कुछ काम संभालने लगे।   सारा राज कारज सम्भाला। 

मीरा को मेवाड़ वापस लाने के लिए राणा उदय सिंह कहते हैं हम लोग तो इस काबिल भी नहीं रहे उन्हें वापस आने के लिए कहें हमारे विक्रम राणा और उनके साथियों  ने मिलकर उन्हें इतना सताया है हम उन्हें किस मुंह से वापस आने के लिए कहें। हम लोग तो मेड़ता वासी मुंह दिखाने लायक भी न बचे। 

सब लोग द्वारका पहुँचते हैं.वहां पहुंचकर  अन्न  जल लेना भी छोड़ देते  हैं समस्त मेड़ता वासी -प्रायश्चित स्वरूप ,के बस किसी प्रकार मीरा जी वापस लौट आएं।मेवाड़ अपनी सुसराल। 

 मीरा जी कहतीं हैं मैं वहां वापस नहीं आ  सकती  अब, जहां अधर्म हो ,साधु संतों का अपमान हो ,उदय सिंह जी के हृदय के भाव से किया गया प्रायश्चित मीरा बाई नज़रअंदाज़ नहीं कर पातीं  कहने लगी है ठीक है में द्वारकाधीश जी से पूछती हूँ :

बनवारी रे जीने का सहारा तेरा नाम रे ,
मुझे दुनिया वालों से क्या काम रे । 

गाते  हुए मीरा जी मंदिर के गर्भ गृह में पहुँच गईं हैं। और जैसे ही मीरा जी ने हाथ उठाकर कहा -

मेरी बांह पकड़ लो श्याम रे ......

अगर आपने नहीं पकड़ीं तो ये दुनिया वाले मुझे खींच के ले जायेंगे। मूर्ती का हाथ आगे बढ़ता है और मीरा मूर्ती में समा जातीं हैं। 

मीरा कृष्ण में से ही प्रकट  हुईं  थीं  ,उन्हीं के लिए जीवित रहीं और अंततया उन्हीं में समा गईं।उदय सिंह राणा फूट -फूट कर रोते हैं जब मंदिर के पुजारी बतलातें हैं मीरा तो कृष्ण में समा गईं। 
इसे विज्ञान के नज़रिये से मत परखिये भाव की दृष्टि  से देखिये मीरा का विलोपन अप्रकटन ,अव्यक्त होना। आत्मा का परमात्मा में लीन  होना है।   

आइये अब राम कथा के ज़ारी प्रसंग में प्रवेश करते हैं : 

इधर राम के अभिषेक की तैयारी ज़ोरशोर से चल रहीं हैं उधर देवताओं में सुगबुगाहट के साथ एक षड्यंत्र चल रहा है। 

देवता सरस्वती को बुलाकर कहते हैं किसी  भी हालत में यह राज्याभिषेक नहीं होना चाहिए ,परमार्थ के लिए थोड़ा अपयश भी लेना पड़े तो कोई हर्ज़ नहीं तुम विघ्न पैदा करो अयोध्या में जाकर। 
सरस्वती सोचतीं हैं किसकी बुद्धि बिगाड़ू ये तो धर्म नगरी है अंत में दृष्टि मंथरा पर जाती है जो कैकई के दहेज में आई थी। 

मंथरा स्त्री नहीं है कुसंग है। अयोध्या नगरी में कुसंग भी घुसा हुआ है वह भी उसके घर में जिसके घर में स्वयं भक्ति रानी सीता जी हैं भगवान बेटा बन के आते हैं ,भरत जी जैसे तपस्वी मौजूद हैं ,लक्ष्मण जी जैसा काल रूप अनंत शेष मौजूद है। कथा का सन्देश यह है कुसंग किसी भी घर को नहीं छोड़ता है जब अयोध्या के दशरथ परिवार को नहीं छोड़ता तो हमारे आपके परिवारों को कैसे छोड़ सकता है। 

अयोध्या को अनाथ करवा दिया इसी मंथरा ने और इसका कोई  बालबाँका भी न कर सका। एक बार अगर जीवन में कुसंग प्रवेश कर गया फिर जाता नहीं है। जिसके हाथ में एक बार रंगीन बोतल आ गई पत्नी रो रोके बर्बाद हो जायेगी बोतल नहीं छुड़वा सकती। 

सतसंग न करो चलेगा लेकिन कुसंग  मत  करिये -भगवान् श्री राम इस बात को बोल रहे हैं  विभीषण को :

बरु बलवात नरक करि भ्राता, 
दुष्ट संग जेहि देहि विधाता। 

जिस कार्य को करते समय जिस आचरण को ,क्रियाको  ,व्यवहार को करते समय मन के किसी कौने  में यह बात आने लगे कोई देख लेगा तो क्या कहेगा -ये ही कुसंग है ,लाल बत्ती है इसका आदर करिये। लाल बत्ती बोलती  है इसकी अनदेखी करोगे तो मरोगे।

कैकई मामूली स्त्री नहीं है जिसके गर्भ से भरत जैसे महा -तपस्वी पैदा हुए जो चारों युगों में केवल एक बार ही आता है केवल त्रेता में ही आता है ऐसा तपस्वी और किसी युग में एक बार भी नहीं आता है ।

 भगवान् श्री राम ने कभी कौशल्या जी का दूध नहीं पीया कैकई का ही पीया है ,बचपन में ये दोनों बालक राम और भरत  रूप साम्य होने की वजह से ही बदल जाते थे। इसीलिए भरत ने हमेशा कौशल्या जी का और राम ने कैकई का ही दूध ज्यादा पीया है।

जिसके हृदय से भगवान् लगे रहे उसकी भी बुद्धि बिगाड़ी जा सकती है ये कुसंग ऐसा है। 

"मुझे प्रमाण दीजिये कैकई से कहतीं है मंथरा बारबार "-मुझे प्रमाण दीजिये कौशलया माँ चतुर चालाक कुटिल नहीं है।
कैकई एक झाँपड़ रसीद करतीं हैं कहते हुए प्रमाण मांगती है जिसकी कोख से भगवान् राम प्रकट हुए हैं वह कौशल्या माँ तुझे कुटिल दिखाई देतीं हैं। 

लेकिन थप्पड़ खाकर भी मंथरा हार नहीं मानती कहती है आपका नमक खाया है मैंने और मार लो बेशक और अपनी खुद की कुटिलता को वजन देने के लिए और भी ज्यादा जी जान से जुट जाती है।
सौत (कौशल्या )की सेवा करने से अच्छा है अलग रहो भरत के साथ ,राम के लिए वनवास की मांग करो।भरत के लिए राज्याभिषेक। 

 कुसंग कैकई को 'कनक -भवन' से 'कोप -भवन' में भेज देता है। 
कुसंग यही करता है।

"कोप भवन सुनी सकुचै राऊ " ......... 

तुलसीदास कहते हैं 'काम' का प्रभाव देखिये राम राज्य अभिषेक से पहले जाना चाहिए था दशरथ जी को कौशल्या के पास आ गए कैकई के पास जो कोप भवन में पड़ी हुई है। 
एक बे -अदबी दशरथ जी ने  वशिष्ठ जी को राजमहल में बुलाकर की थी राम को सन्देश भिजवाने के लिए के जाओ राम को उपदेश करके आओ।बतलाओ -कल तुम्हारा राज्याभिषेक है आज की रात संयम से रहना। 

 भेजना तो राम को गुरु के पास था के जाओ गुरु का आशीर्वाद लेकर आओ -कल तुम्हारा राज्याभिषेक है। काम उलटा ही किया गुरु वशिष्ठ को ही बुला भेजा राम के भवन में संदेशा लेकर जाने के लिए। 

रघुकुल रीति सदा चली आई ,
प्राण जाए पर वचन न जाई। ....... 

मांगों क्या  मांगती हो रानी- कोप भवन से निकल के-दशरथ मनुहार करते हुए बोलते हैं। हम रघुवंशी हैं राम की कसम खाकर कहते हैं जो तुम मांगोगी वही वर दे देंगे। 

ठीक उसी समय कौशल्या जी आरती का थाल लेकर पूजा घर की ओर  जाती हैं के आरती का थाल उनके हाथ से गिर गया यह एक बड़ा अपशकुन था। महल के द्वार तिरछे होने लगे।अयोध्या का भाग्य उससे रूठने लगा। 

मेरा पहला वरदान भरत को अयोध्या का राज्य।दूसरा वरदान राजन मेरा ध्यान से सुनना -तपस्वी वेश में उदासीन व्रत लेकर राम को चौदह बरस का वनवास। 
दशरथ जी भूमि पर गिर गये कहने लगे तुमने क्या कहा मैं  ठीक से सुन नहीं पाया -दोबारा कहिये।

दशरथ पत्थर की मूर्तीवत हो गए कैकई का हाथ उनके हाथ से छूट गया। बोले रानी तुझे पाप लग जाएगा -ऐसा कठोर वर मत मांग। महाराज ने कैकई के मुख पे हाथ रख दिया -मुझे पहले वरदान में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन दूसरा वरदान तुमने कैसे मांग लिया। राम से ऐसा क्या अपराध हो गया कल तो तुम कहती थी राम का अभिषेक करो हम दोनों वन में जाकर रहेंगे। मैं राम की तरफ से क्षमा मांग लूंगा। मुझे प्राण भीख में दे दो ,गऊ की हत्या मत करो मैं तुम्हारी काली गाय हूँ। कैकई धक्का दे देती है दशरथ जी को -

नहीं देना था वरदान तो क्यों महादानी बनने का नाटक कर रहे थे। 

कटे पंख के पक्षी से महाराज चिल्ला रहे हैं हे महाकाल भगवान् ,हे शंकर भगवान् आज मुझे एक वरदान दे दीजिये मेरे बेटे से कह दो मेरी बात आज न माने। 

प्रात : काल सुमंत आये हैं और सारा षड्यंत्र राम को बताते हैं। कैकई के भवन में जाकर राम कैकई से पूछते हैं मुझे बताइये हमारे पिता क्यों आज इतने व्यथित हैं जिसके चार चार बेटे हों वह आज इतना दुखी क्यों हैं मुझे बताओ पिता जी के दुःख का कारण  क्या है। ऐसा कौन सा दुःख आ गया जिस ने इनकी ये हालत बना दी।
अगली सुबह सारी अयोध्या नगरी विलाप करने लगी। कौशल्या जी को कुछ पता नहीं है राम उनकी आज्ञा लेने जा रहे हैं वनवास की घटना बताने से पहले। सुमंत का लड़का राम जी के साथ था जिसने सारी  घटना   कौशल्या जी को बताई। 

देखो राम अगर ये बात सिर्फ तुम्हारे पिता ने कही होती ,मैं इसे इतना वजन न देती ,कैकई तेरी माता हैं अगर ये बात दोनों माँ और पिता ने कही है तो तुम जाओ। उनकी आज्ञा का पालन करो। 

अब जानकी जी चिंतित हो राम से पूछती हैं इस संकट के बारे में। राम कहते हैं मेरी माँ को जीवित रखना मेरे पीछे अपनी सेवा से। 

जानकी जी बोलीं प्रभु आपको मालूम है मैं कौन हूँ ?

मैं आपकी छाया हूँ। 

जिय बिनु देह नदी  बिन  वारि  ,

तैसीहि नाथ पुरुष बिन नारी।

पति के बिना पत्नी  वैसे ही अर्थहीन है जैसे नदी जल के बिना ,प्राण के बिना शरीर।इतने में ही लक्ष्मण जी भी आ गए -बोले भगवान् आप किसे समझा रहे हैं मेरे तो माता पिता सिर्फ आप ही हैं मैं किसी पिता दशरथ और माता सुमित्रा को नहीं जानता। 
बड़ा रोचक प्रसंग है लक्ष्मण जी के जन्म के बारे में पैदा तो चारों बच्चे एक साथ ही लगभग लगभग हुए थे लेकिन पैदा होने के बाद लक्ष्मण जी ने कई दिनों तक न आँख खोली न दूध पीते थे ,बेहद रोते  रहते थे न सोते थे न दूध पीते थे बस रोना ही रोना। 

सुमित्रा जी चिंतित होकर लक्ष्मण जी को लेकर गुरु वशिष्ठ जी के पास  गईं ,सारी बात बतलाई। गुरु ने लक्ष्मण जी को ध्यान से देखा और बोले अरे !ये तो शेषनाग है भगवान् राम की शैया है राम से अलग सोयेगा कैसे। इसे राम की शैया  पर  ही सुलाओ।उनका अंगूठा इनके मुंह में दो तभी ये सोयेगा बालक और दूध भी तभी पीयेगा ,और हुआ भी  ऐसा ही।जब कभी अंगूठा मुंह से निकल जाता था लक्ष्मण जी रोने लगते थे। आज यही घटना लक्ष्मण जी भगवान् को याद दिला रहे हैं कहते हुए मैं आपके बिना जीवित नहीं रह सकूंगा। राम जी आखिर में कहते हैं अच्छा ठीक है माँ सुमित्रा जी से आज्ञा लेकर आओ वह आज्ञा दे देवें तो चलो तुम भी। 

सुमित्रा बोलीं मैं तो तेरी देह की माँ हूँ 

" तात! तुम्हारी मातु वैदेही ,

पिता राम ,सब भाँती स्नेही ,

अवध तहाँ जहां राम निवासु ,

तहिं दिवस जहां भानु परतापु। "

तेरी शाश्वत माँ वैदेही हैं जिनका न जन्म है न मृत्यु हैं जो शाश्वत  हैं।यहां घर में तुम्हारा कोई काम नहीं है हमारे पास महल में ,  जाओ माँ जानकी और भगवान् के साथ उनकी सेवा करो। मैं तो तुम्हारी धरोहर की माँ हूँ क्योंकि तुम मेरे गर्भ में आये तुम्हारे शाश्वत माता पिता राम और वैदेही  ही हैं।  भगवान्  कैकई जी की आज्ञा से वन नहीं जा रहे हैं :

तुमरै भाग राम वन जाई ,
दूसर हेतु तात कछु   नाहिं ।

तुझे मालूम नहीं ,मुझे मालूम हैं बोली सुमित्रा जी लखन से ,तू शेष नाग का अवतार है धरती तेरे सिर पर है ,भगवान् तेरे सिर का ही भार कम करने जा रहे हैं,पृथ्वी पर पाप का बोझ बहुत बढ़ गया है ,उसे कम करने के लिए ही भगवान् वन जा रहे हैं।  तुझे मेरे दूध की कसम हैं दोनों की सेवा में कोई विकार स्वप्न में भी  न आये। लक्ष्मण जी बोले माँ में जागृत अवस्था का तो वचन देता हूँ सोते हुए व्यक्ति को कुछ इल्म नहीं रहता कोई विकार उससे हो सकता है इसलिए मैं सौगंध लेता हूँ जब तक भगवान् वन में रहेंगे मैं सोऊंगा नहीं।यहां से लक्ष्मण जी उर्मिला को मिलने जाते हैं वह प्रसंग अति मार्मिक है जिसका वर्रण कथा के अगले अंक में होगा। 

जयश्रीराम !जयसियाराम !     

"तापस वेश विशेष उदासी ,

चउदह बरस राम वनवासी। "   


सन्दर्भ -सामिग्री :

(२ )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 15 Part 2


(१ )https://www.youtube.com/watch?v=AVs6_18RjIc

(२ )

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

क्या वजहें बनतीं हैं केल्सियम की कमीबेशी की ? कैल्शियम की कमीबेशी के लक्षण ?

केल्सिअम का काम केवल हड्डियों (अस्थियों )और हमारी मुक्तावली  (दन्तावली )हमारे दांतों को ही मजबूती प्रदान करना नहीं है यह हमारी कोशिकाओं (कोशाओं या सेल्स ,सेलों का )एक सजग संचार तंत्र ,टेलीफोन एक्सचेंज है। हमारे स्रावी तंत्र को चौकस रखता है ,खून का थक्का  बनने , पेशीय -संचालन , जरूरी संकोचन या सिकड़ाव ,मसल -कॉन्ट्रेक्शन ,हारमोन -स्राव सबके  नियंता भी हैं  कैल्शियम के खनिज ,गरज़ ये के , केल्सियम  के आयन बहुविध हमारे शरीरक्रियाविज्ञान को चलाये रहते हैं। 

केवल अस्थि -क्षय(ऑस्टियोपोरोसिस ) ,अस्थि द्रव्यमान का क्षय ही इसकी कमीबेशी का कारण नहीं बनता है ,इसकी कमीबेशी और भी रोगों को हवा देती है। अनेक रोग केल्सियम की कमीबेशी के लक्षण रूप ही प्रकट होते हैं जिनकी चर्चा अब हम आम  करते हैं : 

क्या वजहें बनतीं हैं केल्सियम की कमीबेशी की ?

इसकी एक अहम वजह तो हमारे कथित आधुनिक खानपान से ही जुड़ी  है ,अधिकाँश लोग -क्या अमीर ,क्या गरीब क्या विकसित और क्या पिछड़े देशों के , खुराकी कैल्शियम और कैल्शियम पूरकों को मिलाकर भी कैल्शियम की रोज़मर्रा की आपूर्ति माहिरों की सिफारिशों के अनुरूप नहीं कर पाते हैं।

खून में केल्सियम के निचले स्तर की वजह ,खुराक से केल्सियम की जज़्बी न हो पाने की अन्यान्य वजहें बनती हैं कुछेक का उल्लेख करते चलें -

(१ )विटामिन -D की कमी 

(२ )मैग्नीशियम की कमी 

(३ )खुराक में टेबिल साल्ट खाने के नमक का ज़रुरत से ज्यादा रहना (अचार ,पापड़ ,चिप्स ,चाट पकौड़ी सब नमक लिए रहते हैं )

(४)खाद्य संयोजियों ,कोला पेयों के अधिक चलन से फॉस्फोरस जरूरत से ज्यादा हमारे शरीर में प्रवेश ले रहा है ,कैल्शियम की जज़्बी में  यह एक बड़ी बाधा बनता है। 
(५)कुछ मेडिकल कंडिशन्स यथा लम्बे समय तक गुर्दों की समस्या का बने रहना यानी chronic kidney disease 

(6) नैक (neck ) /थायरॉइड सर्जरी /किसी ऑटो -इम्यून डिज़ीज़ की वजह से पैराथाइरॉइड का ठीक से काम न कर पाना ,एब्नॉर्मल पैराथायरॉइड फंक्शन 

खाने की परम्परागत थाली -दूध ,दही ,पनीर ,सलाद ,संतरा अंजीर ,बादाम ,चीनी बंद गोभी (Bok Choy ),पुष्टिकृत सोइ - मिल्क (सोयाबीन की फलियों से तैयार पुष्टिकृत दूध ),के अलावा साडीन (सार्डीन -बहुत रूपहली खाद्य मछली )भी खासा केल्सियम लिए रहती है। सामिष भोजन करने वाले ले सकते हैं। 

विस्तार के लिए देखें उल्लेखित सेतु :

10 calcium-rich foods for your bones


https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/health-fitness/diet/6-calcium-rich-foods-for-your-bones/articleshow/ 

कैल्शियम की कमीबेशी के लक्षण ?

केल्सियम कमी के लक्षण अप्रकट (नदारद )भी रह सकते हैं हल्के और उग्र रूप भी -

(१)केल्सियम की कमी का लम्बे समय तक बने रहना ,इसकी तरफ ध्यान न दिया जाना सूखा रोग (रिकेट्स,रिकिट्स ,rickets ),ऑस्टियोपोरोसिस (अस्थि  -क्षय ,जिसमें अस्थि  द्रव्यराशि ,बॉन- मॉस का क्षय होने लगता है ),ओस्टेओपेनिअ ,osteopenia (अस्थि  -क्षय रोग से पूर्व की स्थिति ही है यह जिसमें बॉन मॉस डेंसिटी कम होती जाती है ) 

आइये अब ,केल्सियम के निम्न स्तर तथा केल्सियम कमी से पैदा कुछ लक्षणों का ज़ायज़ा ले लेते हैं :

(१ )बे -होश होना 

(२ )दिल का पूरी क्षमता से काम न कर पाना -हार्ट फेलियोर 

(३ )छाती (सीने का दर्द ,chest pain )

(4 )उँगलियों -अगूंठों ,मुख के गिर्द सुन्नी ,जड़ता ,संज्ञा -शून्यता ,सुन्नता ,नंबनेस ,इन अंगों में झुनझुनी चढ़ना -लगना जैसे कीलें सी चुभ रहीं हैं ,झरबेरी सी चुभन का महसूस होना यानी टिंगलिंग होना। 

(५ )मांस पेशी में दर्द भरी ऐंठन ,हिला न पाएं ऐसा लगना ,(Muscle Cramps )का होना ,

मांस -पेशी की यकायक ऐसी हरकत का होना जिसे आप  नियंत्रित  न कर पाएं ,काबू न पा सकें जिस पर ,इसे आप ऐंठन या मरोड़ या फिर पेशी -अकुंचन भी कह सकते हैं मसल स्पाज्म (स्पैज़्म ),Muscle Spasm भी। 

(६ ) घर्र -घर्र करते हुए ही सांस ले पाना व्हीज़िंग (wheezing ) -सांस (दमा asthma )के मरीज़ इसे बेहतर समझ सकते हैं।छाती में  शिकायत  से ग्रस्त लोग भी।

(७ )सटकने ,निगलने में दिक्कत 

(८ )कंठ,स्वरपेटी ,गले का ऊपरी भाग जिसमें मासपेशियां स्थित होती हैं - की ऐंठन(spasm of the larynx) से पैदा स्वर में बदलाव ,आवाज़ जो आपके सिग्नेचर होते हैं का बदलाव। 

(९)चिड़चिड़ापन ,अवसाद ,ज्ञान -बोध में कमी ,व्यक्तित्व में बदलाव के संकेत 

(१० )थकान 

(११ )किसी बिमारी जैसा तेज़ झटका लगना खासकर दिमाग पर इसका असर (Seizures )

(१२)केशों का (बालों का  )खुरदरा पन,रूखापन 

(१३ )नाखूनों का भुरभुरा होना (brittle nails )

(१४ )चमड़ी या त्वचा रोग  सोरायसिस (Psoriasis )जो अति कष्टकारी होता है जिसमें चमड़ी पर red scaly patches उभर आते हैं। कवच या शल्क से ढके रहते हैं ये चर्म उभार।जिनमें जलन और खारिश  होने लगती है। 


Psoriasis is a common skin condition that speeds up the life cycle of skin cells. It causes cells to build up rapidly on the surface of the skin. The extra skin cells form scales and red patches that are itchy and sometimes painful. 

There is no cure for psoriasis, but you can manage symptoms. Lifestyle measures, such as moisturizing, quitting smoking and managing stress, may help.

(१५ )चमड़ी का  रुक्ष -पन (dryness of skin )

(१६ )दंत क्षय (tooth decay )

(१७ )खुजली (खारिश )का दीर्घ काल तक रहना (chronic itching )

(१८ )पेशीय कमज़ोरी 

(१९ )सफ़ेद मोतिया (cataract )

(२०)अस्थि क्षय के लक्षणों का प्राकट्य -मुखर होना उग्र होना ऑस्टियोपोरोसिस के लक्षणों का -कमर दर्द ,रीढ़ ,कलाई ,नितम्ब (hip )की अस्थियों का आसानी से टूटना भंगुर हो जाना ,  सिर और कन्धों का आगे की  ओर  मुड़ना और मुड़कर झुकना कुलमिलाकर हाइट का ह्रास होना। 

सन्दर्भ -सामिग्री :

(1)http://whatcounts.com/dm?id=6A7A313FC4A3E19057093761E614E3F0F30B90B65866C411

(2)https://universityhealthnews.com/daily/nutrition/21-calcium-deficiency-symptoms-that-will-surprise-you/?mqsc=E3919643&utm_

(3)https://universityhealthnews.com/daily/nutrition/



21-calcium-deficiency-symptoms-that-will-surprise-you/?mqsc=E3919643&utm_source=WhatCou

(4)https://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/psoriasis/symptoms-causes/syc-20355840

Calcium Deficiency Treatment and Prevention,How to Increase Calcium Intake?(Hindi ll )

कितना और कैसा ,  और किस रूप में आपको खुराकी और संपूरण कैल्सियम चाहिए नित्य ताकि कैल्सियम की कमीबेशी से आप बचे रहें ?आदर्श सेहत रोज़ाना कितने कैल्सियम की मांग करती है ?


इन सवालों पर इन दिनों खासा विवाद  है माहिरों और पुष्टिकर तत्व  विज्ञान के माहिरों की आज कोई एक राय नहीं है इन सवालों पर इसीलिए रिक्वायर्ड डेली अलाउंस (RDA)के स्थान पर इन दिनों नै शब्दावली एडीकुएट  इंटेक्स फॉर कैल्सियम (आवश्यकता के अनुरूप कैल्सियम की नित्य पर्याप्त रहने वाली मात्रा ) चलन में आई है। 

यानी कैल्सियम की उतनी मात्रा रोज़ाना ली जाए जो अस्थियों के स्वास्थ्य के लिए एक हेल्दी व्यक्ति को नित्य चाहिए।एक सेहतमंद व्यक्ति के लिए उपयुक्त हो। 

इसे ५० साल तक उम्र के बालिगों (वयस्कों ,एडल्ट्स )के लिए १००० मिलीग्राम तथा इससे ऊपर ५१ साला और अधिक आयु वर्ग के लिए १२०० मिलीग्राम नित्य ली जानी उपयुक्त समझी गई है। 

इत्तेफाकन मैं ऐसे कई बाख़बर बुजुर्गों को जानता हूँ जो बरसों से इस सिफारिश से कहीं ज्यादा १५०० मिलीग्राम कैल्सियम कुलमिलाकर लेते  रहें हैं ,कई तो सम्पूरण (supplements ) रूप में ही इतना कैल्शियम नित्य लेते रहे हैं।

उनके लिए नै सिफारिश ज्यादा महत्व रखतीं हैं वे कृपया गौर करे। 

आज का अमरीकियों का बहुलांश उल्लेखित सिफारिशों के अनुरूप कुलमिलाकर भी इतना  कैल्सियम नहीं ले पा रहा है और इसीलिए इनमें कैल्सियम की  कमीबेशी के लक्षणों की संभावना बनी हुई है। खासकर बोन डेफिशियेंसी कैल्सियम की। 

कैसे बढ़ाया जाए कैल्सियम का संग्रहण, रोज़ाना का इंटेक ?

(१ )यदि आप खून में कैल्सियम में कमी के लक्षणों से गुज़र रहे हैं तब खुराकी कैल्सियम की मात्रा बढ़ाइए (जो दूध, दही ,सोया मिल्क ,अंजीर ,संतरा ,बादाम ,सारडाइन (साडीन ,सार्डीन आकर्षक रंगों वाली खाद्य मच्छी ,सामन मच्छी अस्थि युक्त आदि से सहज सुलभ है ).सफ़ेद तिल (सेसमे )से तैयार खाद्य,फूल और बंद गोभी की अनेक किस्में :

 ब्रॉकली ,कोलार्ड्स(स्कॉटलैंड बंद गोभी ) ,कैल (कइल ),बोक चोय (चीनी बंद गोभी )आदि ,सरसों और शलगम के पत्ते (turnip greens )सेसमे (sesame सफ़ेद तिल  ) भरपूर कैल्सियम (कैल्सियम का उच्च मान )लिए हैं। 

कैल्सियम सम्पूरक  के रूप में   कैल्सियम सिट्रट और कैल्सियम सिट्रट मलते (calcium citrate malate )खाने के साथ दो बार में  लीजिए सिफारिश की गई मात्रा की खुराक को। भोजन के साथ लेने में इसकी बेहतर जज़्बी होगी। 

अंग्रेजी में भी पढ़िए दोनों किस्तों का सार रूप :

 Calcium Deficiency Treatment and Prevention

Just how much calcium from diet and supplements is needed, and in what form, to prevent calcium deficiency symptoms? How much is required to achieve optimal health?
These questions are currently the subject of much controversy and debate among researchers, doctors, and nutritionally savvy individuals alike. The Food and Nutrition Board of the Institute of Medicine concluded that there are insufficient data from which to determine the RDA for calcium. Instead, they established Adequate Intakes (AIs) for calcium, which are the amounts thought to be sufficient to maintain bone health in healthy people. The AI for adults up to age 50 is 1,000 mg of calcium per day from food and supplements combined. For adults 51 and older, it’s 1,200 mg. As mentioned above, most American adults fail to meet these requirements, even when they take supplements, which can result in bone deficiency symptoms.[1]

How to Increase Calcium Intake

If you experience low calcium in blood symptoms, try to get the majority of your calcium from food sources (see our post “Calcium-Rich Food: Tasty Choices Are Easy to Find“). While dairy is a concentrated source of calcium, other components in dairy make it a poor choice for maintaining bone health.
Instead, opt for foods high in calcium; examples: salmon and sardines canned with bones, kale, collards, broccoli, mustard greens, turnip greens, bok choy, and sesame seeds. For calcium supplements, choose calcium citrate or calcium citrate malate, and take it in at least two divided doses with meals for the best absorption.

Avoid Too Much Calcium from Supplements

Keep in mind that it is just as important to avoid getting too much calcium from supplements as it is to get enough. Excessive calcium from supplements may increase the risk of cardiovascular disease and kidney stones, so don’t overdo it. Aim for 1,000 to 1,200 mg from food and supplements combined.

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Are your calcium levels low? How do you ensure adequate calcium intake? Share your ideas with your fellow readers in the Comments section below.

What Is a Cell Signaling Pathway ?


What is cell signalling ?

ब्रितानी इंग्लिश में ,गोरों की भाषा में ,कोशा -संकेतन -कोशाओं में परस्पर सूचना आदान प्रदान का एक जरिया है  जिसके ज़रिये कोशाएं परस्पर समन्वयन करतीं हैं अपने सारे काम काज चलाती रहतीं हैं। ये इनका संचार नेटवर्क है इंट्रानेट है। 

मानव शरीर की पूरी इमारत की नींव है -"सेल -सिग्नलिंग" यह इनका सहज बोध है ,अपने सूक्ष्मतर माहौल को देख परखने तदनुरूप अनुक्रिया करने का बेहतरीन साधन है।शरीर को चोट लगने पर कहाँ पहुँचकर अपनी खुद की आहुति देकर कोशिका को खुंरड बनना,रक्त स्राव को रोकना है ऊतकों  की मरम्मत करनी है सब कुछ कोशिका संचार का यह साधन ही करता है। रोग प्रतिरोध -सुरक्षा- तंत्र का सहज बल है यह संकेतन। 

टिश्यू  होमेओस्टासिस का भी यही संचार -तंत्र  पुख्ता आधार है। होमोस्टासिस  एक प्रकार का फीडबैक कंट्रोल ही है जिसके द्वारा कोशाएं अपनी अंदरूनी दशा का नियंत्रण विनियमन करतीं हैं। 

परम्परागत जीव- विज्ञान ने अपना पूरा ध्यान कोशिकाओं के नैजिक सिग्नलिंग पाथवे के अध्ययन को ही समर्पित किया है बेहद ध्यान दिया है इन संचार सेतुओं मार्गों की टोह लेने में। 



The tendency of an organism or a cell to regulate its internal conditions, usually by a system of feedback controls, so as to stabilize health and functioning, regardless of the outside changing conditions  

Cell signaling (cell signalling in British English) is part of any communication process that governs basic activities of cells and coordinates all cell actions. The ability of cells to perceive and correctly respond to their microenvironment is the basis of development, tissue repair, and immunity, as well as normal tissue homeostasis. Errors in signaling interactions and cellular information processing are responsible for diseases such as cancerautoimmunity, and diabetes.[1][2][3] By understanding cell signaling, diseases may be treated more effectively and, theoretically, artificial tissues may be created.[4]

Traditional work in biology has focused on studying individual parts of cell signaling pathways. Systems biology research helps us to understand the underlying structure of cell signaling networks and how changes in these networks may affect the transmission and flow of information (signal transduction). Such networks are complex systems in their organization and may exhibit a number of emergent properties including bistability and ultrasensitivity. Analysis of cell signaling networks requires a combination of experimental and theoretical approaches including the development and analysis of simulations and modeling.[5][citation needed] Long-range allostery is often a significant component of cell signaling events.[6]










Reeference:

Today's Features


(1)http://whatcounts.com/dm?id=6A7A313FC4A3E19057093761E614E3F0F30B90B65866C411

(2)https://universityhealthnews.com/daily/nutrition/21-calcium-deficiency-symptoms-that-will-surprise-you/?mqsc=E3919643&utm_

(3)https://universityhealthnews.com/daily/nutrition/

21-calcium-deficiency-symptoms-that-will-surprise-you/?mqsc=E3919643&utm_source=WhatCou

(4)
calcium deficiency symptoms
Experiencing the sort of calcium deficiency symptoms listed in our lead story? Remember that you can access good sources of calcium via broccoli, dairy, and avocado.
© Robyn Mackenzie | Dreamstime.com

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 14 Part 2 , 3

आये थे हरी भजन को ओटन लगे कपास 

नामदेव जी प्रभु का नाम लेकर उतर  गए यमुना जी में और एक के बाद एक शैया यमुना में से निकालकर सिकंदर लोदी को दिखाने लगे तुम्हारी जो भी है पहचान लो। लोदी ने पाँव पकड़ लिए नामदेव जी के ,और कहा मुझसे कुछ ले लो -नामदेव बोले आइंदा किसी हिन्दू फ़कीर को इस तरह तंग मत करना।बस मुझे और कुछ नहीं चाहिए। मुझे तो भगवान  के श्री चरणों की रज चाहिए बस।

नामदेव जी ने वह रत्न जटित शैया जो सिंकंदर लोदी ने भगवान् के शयन के लिए दी थी यमुना में फेंक दी थी -मैं कहाँ तक इस कीमती शैया की हिफाज़त करूंगा अभी तो बादशाह के सैनिक हैं हिफाज़त के लिए आगे के सफर में  इसकी देख भालकौन करेगा  जब सैनिक लौट जाएंगे। कहाँ करने देगी ये रत्न जटित  शैया भजन ।   

नाम की महिमा सिद्ध करके दिखाई थी नामदेव जी ने। उनके दो बूँद आंसुओं से कुँए का पानी ऊपर आ गया था उनकी पुकार सुनकर।संत ज्ञानदेव (ज्ञानेश्वर जी )तो योग सिद्धि से छोटे होकर कुँए में उतरे और जल पीकर पुन : निकल आये। नामा तो निरे भजनी साधु जिहने सिद्धि विद्धि कुछ नहीं आती सिर्फ भगवान् का भजन करना आता है कुँए में झाँक झुक कर रोने लगे -नामा प्यासा ,नामा प्यासा ,प्यासा ही मर जायेगा ,भगवान तुम्हारा नामा ,उनकी आँख से निकल कर दो आंसू कुँए के जल में मिल गए। शुद्ध भक्ति के आंसू थे ये। जल एक उफान के साथ ऊपर आ गया सब ने खूबी पीया। ज्ञानेश्वर नामा के चरणों में गिर गए -आज से तू मेरा गुरु।   

एक और उल्लेखनीय घटना उस समय की है जब नामा (नामदेव जी )श्री नाथ जी के दर्शन के लिए राजस्थान आते हैं। राजस्थानी नै जूती की जोड़ी आपने बगल  में दबा रखी थी जिस पर वहां के पंडों की नज़र पड़  गई थी ,इनकी ख्याति से ये पण्डे पहले ही आतंकित थे मौक़ा देखा किसी ने बता दिया था नामा की बगल में जूते हैं पंडों ने इन्हें धक्का देकर मंदिर से बाहर फेंक दिया।तेरी ये मज़ाल एक नीच जाती और ऊपर से ये हिमाकत जूती लेकर मंदिर में आएगा।  

नामा जी मन्दिर के पिछवाड़े जाकर रोने लगे वहीँ से भगवान को पुकारने लगे। तभी कबीर दास प्रकट हुए उन्होंने नामा से कहा चलो गरीब की यहां कौन सुनता है तभी प्रभु ने लीला की -देखा मेरे दो सेवक जा रहे हैं मेरा दर्शन किये बिना ही। 

और मंदिर का मुख नामा की तरफ कर दिया। 

लेकिन मंदिर को घुमाने की प्रक्रिया में भगवान् की कमर में लचक आ गई। अगर किसी दिन नामा दर्शन को नहीं आ पाते थे भगवान् अधीर हो जाते थे। एक दिन नामा की पत्नी ने कहा -रोज़ रोज़ आप ही जाते हैं कभी भगवान हमारे घर में नहीं आ सकते। 

भगवान बोले इतनी देर कौन खड़े होगा मंदिर में जहां चोबीस घंटों लोग दर्शन करने आते हैं -पत्नी बोलीं उतनी देर आप खड़े हो जाना। 

भगवान् बोले आजा बेटा आजा। भगवान् ने अपना श्रृंगार उतारा और नामा को पकड़ा दिया -नामा को खड़े खड़े दर्द होने लगा ,हाज़त होने लगी पेशाब करने की। नामा उलझ गए भगवान् से दो घंटे की कह कर गए थे छः घंटे लगा दिए। 
ये भगवान् ही हैं जो भक्तों के लिए चौबीस घंटों खड़े रहते हैं। भगवान राम और श्री कृष्ण  कहीं भी बैठे हुए नहीं मिलते हैं खड़े ही रहते हैं। ओरछा में ही एक मूर्ती है जहां भगवान् आपको बैठे हुए भी मिलेंगे। बिठ्ठल नाथ भी भगवान् कृष्ण के ही अवतार हैं।भक्तों की सहायता के लिए भगवान् चौबीस घंटों खड़े रहते हैं न जाने कब दौड़ना पड़े। 

नाना भाँती नचायो भक्तन ने मोहे ,

गज ने पुकारो मैंने गरुण बिसारो ,

द्रौपदी पुकारी मैंने त्यागी द्वारका 

करी  देर नहीं मैंने ,तुरत ही चीर बढ़ायो ,

लोक लाज ही तजि नहीं,

 मैंने वैकुण्ठ ही बिसरायो। 

नाम देव को भूत में भी भगवान् दिखाई देते हैं कुत्ते में भी ,ऐसी आस्था है उनकी भगवान बिठ्ठल में। प्रत्येक में भगवान् बिठ्ठल को ही देखते हैं नामा।कभी बिठ्ठल कुत्ता बनके आते हैं कभी भूत प्रेत नामा की परीक्षा लेने। नामा कभी भी नहीं चूकते  सब में बिठ्ठल ही बिठ्ठल देखते हैं।  

भगवद भरोसे वाले भक्त हैं नामा ,इन्हें भगवान् पर भरोसा है पारस पत्थर पर नहीं जो इनकी  पत्नी कहीं से ले आईं थीं। उनकी एक सहेली इन्हें दे गई थी।  इन्होने पत्नी को न सिर्फ फटकारा ,पारसमणि फेंक  आये,चंद्रप्रभा में।सहेली मांगने आई इनकी पत्नी से लड़ने लगी ,नामा चंद्रप्रभा में उतर  गए जिस भी पत्थर को उठाया  पारस पत्थर हो गया। 

अब राम कथा में प्रवेश करते हैं :

विवाह के बाद जब भगवान् अयोध्या में आते हैं यहां का पूरा दृश्य बदल जाता है।सुन्दर काण्ड संपन्न होता है अब अयोध्या काण्ड प्रारम्भ होता है। जिनके घर में रामचरितमानस हैं -पहली आठ मांगलिक चौपाइयों का प्रतिदिन पाठ करिये उनके घर में कभी गरीबी प्रवेश नहीं करेगी। 

जब ते राम ब्याही घर आये ,

नित नव मंगल मोद बधाये ......  

सब बिधि सब पुर लोक सुहाए   ..... 

मोदक मुद प्रिय मंगल दाता .....

अयोध्या रुपी सागर में रिद्धि सिद्धि रूपा नदियाँ प्रवेश कर रहीं हैं ,मिलन मना रहीं हैं। अभी तक अयोध्या वासी रामचंद्र मुख का दर्शन कर रहें हैं।

लेकिन  दसरथ जी राम का भवन छोड़कर काम का भवन चले गए और देखिये दशरथ जी की क्या दशा होती है। 

आवश्यकता पूरी हो जाती है इच्छा नहीं। आवश्यकताएं बढ़ाओ ,इच्छाएं घटाओ। 
आज राम के विवाह के बाद पहली बार राजसभा बैठी है क्योंकि राजा दशरथ चक्रवर्ती सम्राट हैं आसपास के राजा भी इसमें शिरकत करतें हैं राम भी सभा में बैठे हैं। राजा आइना निकाल कर देखते हैं अपना चेहरा -मुकुट तिरछा और कनपटी के बाल सफ़ेद दिखाई देते हैं। 

मुकुट का तिरछा होना अस्थिर शासन का तथा बालों की सफेदी बुढ़ापे के आने का सत्ता के बूढी होने अस्थिर होने का संकेत है अब सत्ता युवा हाथों में जानी चाहिये। दशरथ जी तभी फैसला करते हैं। सभा के बाद वशिष्ठ  जी को बुलाकर कहते हैं  मैंने तय किया है अब सत्ता राम को सौंप दी जाए वह चारों भाइयों में बड़े हैं तुम राम के भवन में जाकर उसे ये सन्देश दो। 

वशिष्ठ जी राम के भवन में आते हैं जानकी जी ये समाचार राम को देती हैं गुरु समान भगवान् वशिष्ठ आये हैं राम वैसे तो खुश होते हैं गुरु का आना सदैव ही मंगलकारी होता है लेकिन जब उन्हें पता चलता है गुरु दशरथ जी का सन्देश लेकर आये हैं तो उन्हें अच्छा नहीं लगता। होना तो यह चाहिए था राजा गुरु के भवन आते वहां मुझे बुलाते मैं ऐसे राज्य में नहीं रह सकता जहां गुरु का इस प्रकार अपमान हो। 

राम गुरु जी के चरणों में गिर गए कहा आप मुझे बुला अपने भवन बुला लेते आप ने ये कष्ट क्यों किया ?

राम ने तभी अयोध्या छोड़ने का फैसला कर लिया था कैकई और मंथरा तो एक बहाना थे। गुरु ये समाचार देकर चले गए -कल तुम्हारा  राज्याभिषेक है:

आज पूजा में अधिक समय तक  बैठना ,रात को संयम से रहना -यानी सत्ता सेवा धर्म है संयम मांगती है भोग नहीं निजी सुख साधन नहीं परसेवा है सत्ता या गद्दी नशीन होना। लेकिन राम जानकी जी को अपने मन की व्यथा कहते हैं :हम चारों भाई एक साथ पैदा हुए एक साथ पले - बढ़े,एक ही मंडप में एक साथ   ब्याहे गए  ,एक साथ खेले शयन किया फिर राज्याभिषेक मेरा क्यों भरत का क्यों नहीं ?

 बड़ा वह है जो छोटों को बड़प्पन का एहसास कराये। भरत राजा बनते तो मेरा मान और बढ़ता। अभी तो मैं सिर्फ भरत का बड़ा भाई कहलाता हूँ फिर महाराजा भरत का बड़ा भाई कहलाता मेरा मान और भी ज्यादा  बढ़ जाता। ये है राम राज्य की अवधारणा। अपने से छोटों को बड़ा बनाना  न की छोटों को और छोटा होने का एहसास करवाना। उधर देवताओं में अंदर खाने एक षड्यंत्र सभा बैठती है उसमें क्या  फैसला होता है ये  कथा अगले अंक में सुनिए।    


सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )Vijya Kaushal JI Ram Katha Day 14 ,Part 2 ,Ujjain 

(२ )Ram Katha Ujjain Day 14 Part 3 

(३ )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 14 Part 3

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 14 Part 1,2




कथा में प्रवेश से पूर्व इस बार -एक भक्तचरित नामदेव जी का दर्शन कर लें जो कपड़ों की रंगाई का काम करते थे। बहुत अलोकिक संत हुए हैं नामदेव ,इनके पिता हुए हैं वाम देव। वे भी श्रेष्ठ भक्त हुए हैं। 

महाराष्ट्र में   पंढरपुर में एक छोटी  छीपी जाति  में जन्में थे श्री राम देव। जैसे हमारा छोटा बच्चा हमारे साथ खेला करता है वैसे ही भगवान् बिठ्ठलनाथ इनके साथ ऐसे ही खेला करते थे।

इनकी एक बहन भी थी जिसकी बचपन में ही शादी हो गई थी और इनकी ये बहन जल्दी ही विधवा भी हो गई थी।गौड़ाई नाम था इनकी इस बहन का। 

इस घटना का हेतु क्या था -भगवान् अपनी लीला दिखाना चाहते थे या कुछ और ?

भगवान् की इच्छा -उनका हमें दिया हुआ कुछ भी ,अनुकूल भी प्रसाद है प्रतिकूल भी। इसे कैप्स्यूल की तरह सटका जाता है इसका स्वाद लेना अपराध है। प्रसाद प्रसाद है हलुवा हो या चटपटा पोहा  ,जब भगवान् ने भोग स्वीकार कर लिया  ,इसका स्वाद ले लिया फिर हमारा अधिकार स्वाद लेने का नहीं रहता है। 

यही भक्ति है जैसी  प्रभु  तेरी इच्छा :

जहां ले चलोगे वहीँ मैं चलूँगा ,

जहां नाथ रख लोगे वहीँ मैं रहूँगा। 

न कोई उलाहना  है न कोई अर्जी ,

कर लो करा लो जो है तेरी मर्जी ,

तुम जो कहोगे नाथ ,वही मैं करूंगा।

जहां ले चलोगे वहीँ मैं चलूँगा .....

प्रभु ने शुभ ही सोचा होगा। प्रभु हमारे बारे में सदैव शुभ ही सोचता है ,हमारी समझ में वह कई बार नहीं आता है वह और बात है। भगवान् कभी करके दिखाता है -देखता भी है हमें के इसे कृपा ही पसंद है या कभी मेरी इच्छा का भी आदर करता है। जो सिर झुका कर भगवान् की इच्छा स्वीकार कर लेते हैं इन पर कृपा भी जल्दी ही हो जाती है। 

गौड़ाई पूजा पाठ के लिए पिता के साथ लग जाती है। एक दिन इसकी एक सहेली एक बालक को  गोद में लिए इसके पास आती है गौड़ाई बच्चे को बड़े चाव ,लाड़  प्यार से खिलाती है और भगवान् को माध्यम बनाके सोचती है मेरी भी गोद में एक ऐसा ही  बालक होता तो मेरे जीवन में भी कुछ तो होता। 

प्रभु तोअंतर्यामी है इसलिए जो जैसा सोचता है वह वैसा ही कर देता है। चौबीस घंटे में चोबीस बार सरस्वती आती है हमारे पास हमारे शरीर में -जो आप सोचते हैं शुभ या शुभ उस समय आप जैसा सोच रहे होते हैं वही हो जाता है। यह एक सिद्ध बात है।

व्यास पीठ का यही निवेदन है अच्छा ही सोचिये जैसे ही मन अशुभ की ओर  जाए मन को  डाटिये मेरे घर में ठाकुर जी बैठे हैं आप कैसे प्रवेश पा सकते हैं । आप शुभ सोचना प्रारम्भ कीजिये ,अशुभ को तुरंत डाटिये। जैसा मनुष्य चिंतन करता है वैसा होता ही है।होने लगता है। यु बिकम वाट यु थिंक। 

 गौड़ाई भगवान् का रूप निहारती रहती है इसका भगवान् के प्रति आकर्षण मोह हो जाता है कामुक भाव आ जाता है भगवान के प्रति ।भगवान् एक दिन प्रकट हुए इसकी इच्छा पूर्ण कर दी। गौड़ाई गर्भवती हो गई। चारों और इसकी चर्चा होने लगी। छिपने वाली बात तो थी नहीं। निंदा होने लगी। निंदा रसगुल्ले से भी ज्यादा मीठी होती है। निंदा वामदेव जी के भी कान में आ गई। गौड़ाई से पिता ने पूछा -सच सच बताओ क्या हुआ -गौड़ाई ने घटना क्रम बतला दिया। रात को भगवान् वाम देव जी के स्वप्न में भी आये -कहा घबराइए मत।यह बालक मेरा ही अंश है। निंदा की चिंता मत करो। मैं ही अपने एक अंश से आ रहा हूँ।  

जो बालक पैदा हुआ उसका नाम नामदेव रखा गया था क्योंकि जब पंडित जी ने पूछा इस बालक के पिता का नाम क्या है ठीक उसी  समय   आकाशवाणी हुई ये नामदेव है। ये मेरे नाम के प्रभाव से ही प्रकट हुआ है। 

यहीं से नामदेव जी यात्रा आरम्भ होती है। बचपन से ही नामदेव जी भगवान् से खेला करते थे नाना से पूजा -सेवा मांगते थे -अब आप बूढ़े हो गए हैं मुझे पूजा सेवा दे दो। 

एक बार नाना बाहर गए -नामदेव से बोले -बेटा हाथ जोड़ के ठाकुरजी को प्रार्थना  करना दूध में खूब मिश्री मिलाकर उसका भोग लगाना -हाथ जोड़के प्रार्थना करना भगवान् दूध पीओ ,दूध पीओ। भगवान् दूध ज़रूर पिएंगे।

नामदेव ने पर्दा डाल दिया ,पर्दा खोला तो देखा दूध तो वैसा ही रखा है भगवान पी ही नहीं रहे हैं  -नामदेव कहने लगे नाना का दूध तो पी  लेते थे। मेरी सेवा में क्या कमी रह गई ,छुरी उठाई और अपना गला काटने लगे भगवान् तो लीला कर ही रहे थे। प्रकट हो गए।आजा बेटा नामा मेरी गोद  में बैठ जा।भगवान् उस दूध को पीने लगे -नाम देव ने हाथ पकड़ लिया -मेरे लिए तो छोड़िये ,मुझे भूखा रखोगे। 

जानत प्रीती रीति रघुराई ....

भगवान् प्रेम के वशीभूत होते हैं। जब मूर्ती व्यक्ति बन जाती है बात करने लगती है तब वह परमात्मा बन जाती है। अगर भगवान् आपके लिए पत्थर का है तो आप भी उसके लिए पत्थर के ही हैं अगर आप उन्हें जीवित मानते हैं तो वह भी ऐसा ही करेंगे। 

मूर्ती तब तक मूर्ती है जब तक हमारे मन में उसके प्रति प्राणवान भाव नहीं है। 
गरीब किसान की कथा आपने सुनी होगी जिस पर भारी कर्ज़ा चढ़ा हुआ था -किसी महात्मा ने बताया मंगलनाथ को प्रणाम करो नित्य गणेश को पूजो , दो लड्डू नित्य गणेश जी को चढ़ाओ सब विघ्न दूर होवेंगे। कई माह बीते कुछ भी नहीं हुआ। 

एक दिन ये किसान कुम्भ नहाने आया वहां एक और महात्मा मिले इसने उन्हें अपनी व्यथा कथा बतलाई। महात्मा बोले गणेश  का तो खुद का पेट इतना बड़ा है वही भर जाए तो बहुत है तेरा पेट कहाँ से भरेंगे। दुर्गा की पूजा करो जो सब देवताओं में ताकतवर है सिंह की सवारी करती है। 

किसान दुर्गा की प्रतिमा ले आया ,पूजना शुरू कर दिया ,गणेश जी भी पास में रखे हुए थे। अगरबत्ती जलाई और जैसे ही अगरबत्ती का धूम्र गणेश जी की ओर  गया ये भोला किसान अंदर भागा ,रुइ लाया और गणेश जी की नाक में ठूंस दिया कहते हुए -सुसरे काम धाम कुछ नहीं करोगे मुफ्त में अगरबत्ती की खुश्बू  सूँघोगे।

तुरत गणेश जी प्रकट हो गए क्योंकि ये अब तक उन्हें मूर्ती ही मानता था और आज पहली बार इसने उन्हें जीवित समझा इस लिए  तो गणेश जी को भी जीवित रूप आना ही पड़ा। हम भगवान् को क्या मानते हैं पत्थर ,कांसे की प्रतिमा या प्राणवान ?भगवान् भी हमें वैसा ही समझेगा। 

भगवान भी उसी के अनरूप दिखेंगे आचरण करेंगे।यही सन्देश है कथा का यहां। 

भजन तो हमने गाया लेकिन भगवान प्रकट तुझे हुए -

प्रसंग है गुरु समर्थ रामदास और उनकी  गैया चराने वाले भोले भाले  सेवक का जो पेटू होने की वजह से ढैया कहाने लगा था। 

सिर्फ होंठों से मुख़  से भजन करना  एक  बात है और प्रेम पूर्वक भगवान् को प्राणवान बना दिल में बसाकर भजन करना और बात है।गर्मी बहुत बढ़ गई थी ढैया को काम के बीच में घर आकर खाना खाने में तकलीफ होती थी  कहने लगा गुरु जी हम को  आटा नमक आलू आदि दे दीजिये हम वहीँ चोखा बना कर खा लिया करेंगे। गुरु समर्थ रामदास जी बोले ठीक है लेकिन खुद खाने से पहले भगवान् को भोग ज़रूर लगाना ,उन्हें ज़रूर खुद से पहले खिलाना। ढैया ने ऐसा ही किया।  

ढैया ने चोखा बनाने ,रोटी आदि बनाने के बाद भगवान के आगे परोस दिया। आँखें बंद की कहा खाओ भगवान्। ढैया ने जब आँखें खोली देखा भगवान् उसके हिस्से का भी खासा हिस्सा खा गए। दूसरे दिन ढैया ने ज्यादा राशन माँगा। भगवान् फिर आये इस बार सीताजी साथ में थीं। ढैया फिर भूखा रह गया। ढैया ने और अन्ना माँगा रामदास जी से  ,गुरु जी ने दिलवा दिया भंडारे से। 

 इस बार भगवान लक्ष्मण जी को भी ले आये ,इसी तरह अन्ना बढ़वाता रहा ढैया और उधर भगवान का पूरा कुनबा भरत, शत्रुघ्न आदि भी खाने आने लगे। 

भंडारे के लिए नियुक्त व्यक्ति ने समर्थ रामदास जी से कहा यह ज़रूर कुछ गड़बड़ करता है आप जाकर देखो खेत पर एक दिन । एक दिन समर्थ रामदास जी खुद खेत पर पहुंचे छिपकर देखा तो दंग रह गए -भगवान् का पूरा कुनबा जीम रहा था। भगवान् प्रेम के भूखे हैं ढैया भोला भाला साधारण गरीब आदमी था। समर्थ रामदास बोले भजन हम ने किया भगवान् के दर्शन तुम्हें हुए। सन्देश क्या है कथा का -

सबसे ऊंची प्रेम सगाई ,

दुर्योधन की मेवा त्यागी साग विधुर घर खाई। 

जूठे फल शबरी के खाये ,बहुबिध प्रेम लगाईं ......

राम ही केवल प्रेम पियारा ,

जान लेहु जो जानन -हारा। 

नाना जी को नामदेव जी ने  ये घटना बताई है ,परदे के पीछे से नाना वामदेव को दिखाई है के भगवान नित्य दूध पी रहे हैं तो वह भी यही बोले सेवा तो हमने भी की क़ुबूल तेरी सेवा हुई। 

निर्मल मन जन सोइ  मोहे पावा ,

मोहि  कपट छलछिद्र न भावा  ..... 

सहज स्नेह विवश रघुराई ,

पूछी कुशल निकट से आई।

नामदेव जी की लीला अब  प्रारम्भ होती है। 

बोल हरी का नाम ले ले हरि का नाम बिठ्ठल  पांडुरंगा ,

राम वही है श्याम  वही है,कृष्ण वही बलराम वही है ,

सबमें समाई उसकी माया  ,

उसकाभेद किसी ने न पाया पांडुरंगा ,

महिमा उसकी महान  बिठ्ठल पांडुरंगा ,

पांडुरंगा पंढरनाथा पांडुरंगा। 

सिकंदर लोदी द्वारा गाय काटना और नामदेव को विवश करना के वह उस मृत गाय को  जीवित करके दिखलाये अंडर थ्रेट ,वरना तुम्हारा भी यही हश्र होगा। 

सन्दर्भ :यात्रा नामदेव और ज्ञानदेव (संत ज्ञानेश्वर जी )की पंढरपुर से चलके दिल्ली पहुंची थी जहां सिंकंदर लोदी का शासन था उन दिनों।

भारी भीड़ को इस तरह देख सिकंदर लोदी विस्मित था पूछने पर दरबारियों ने बतलाया कोई करामाती हिन्दू फ़कीर है। सिकंदर लोदी ने हुक्म दिया था सेवकों को जाओ उसे  -बुलाकर लाओ।हम भी तो देखें उसकी करामात। 

 नामदेव जी  को कुरुक्षेत्र यात्रा पर अपने संग लाने की इज़ाज़त संतज्ञानेश्वर ने ही  बिठ्ठल भगवान से प्राप्त की थी क्योंकि नामदेव जी ने ऐसा करने से इंकार कर दिया था -ये कहते हुए मैं तो बिठ्ठल जी के सिवाय किसी और को मानता नहीं (अनन्य भक्ति थी आपकी भगवान् बिठ्ठल जी के प्रति। )न ही मैं उनसे तुम्हारे साथ चलने के लिए पूछ सकता हूँ।आप खुद पूँछ लें गुरुदेव उनसे ,इज़ाज़त मिलेगी उनकी तो मैं आपके साथ चल पडूंगा। और ऐसा ही हुआ भी था।  

नंदलाल सांवरिया सँवरिया  मेरे ,

मेरा कोई नहीं सहारा बिन तेरे। 

नंदलाल सँवरिया मेरे  ,

 गुण  गाऊँ सांझ सवेरे  . 

नामदेव जी ने प्रभु से विनती की तेरी महिमा का सवाल है मैं गरीब तेरे सिवाय प्रभु मेरा कोई नहीं इस विपदा से तू ही निकाल कहकर नामदेव जी  गाय  से लिपट कर रोने लगे।

गाय उठकर ख़ड़ी हो गई।  सिकंदर लोदी ने नामदेव जी के पैर  पकड़ लिए।कहा कुछ मांगो -बोले नामदेव देना ही है  तो अपने राज्य में आइंदा किसी हिन्दू फ़कीर को इस तरह मत बुलाना ,गाय की हत्या मत होने देना और अपने राज्य में अधर्म का कोई काम न होने देना हम को  बस और कुछ नहीं चाहिए। हमको कभी दोबारा मत बुलाना -कहकर नामदेव जी निकल आये आगे की यात्रा पर।

प्रसंग जब संज्ञानेश्वर जी ने नामदेव के श्रद्धा से चरण पकड़ लिए जब के संत ज्ञानेश्वर तो उनके गुरु थे। हुआ ये के इनके मन में श्री- नाथ जी ,के दर्शन की इच्छा बलवती हुई। बेहद की गर्मी श्रीनाथ की, रास्ते में एक कुआं पड़ा बड़ी ज़ोर की प्यास लगी हुई थी दोनों संतों को नामदेव जी और गुरु  ज्ञानेश्वर जी को। अब ज्ञानेश्वर जी तो योगी थे योगबल से सिद्धि  द्वारा छोटा शरीर करके कुँए में उतर  गए जल पीकर ऊपर भी आ गए  ,नामदेव जी तो साधू थे उन्हें ऐसी कोई सिद्धि आती  न थी ,बस कुआं में झाँक कर कहते रहे -नामा प्यासा मरा ,नामा प्यासा मरा बिठ्ठल तेरा नामा प्यासा मरा इसी  के साथ रोते हुए नामा के दो आंसू ढुलक कर कुआं में गिर गए। पूरा कुआं उफ़न कर ऊपर आ गया  दो बूँद  आंसुओं के आवेग से।साथ में जितने भी लोग थे सबने जी भर कर जल पीया। इसी के साथ एक अद्भुत घटना घटी -संतज्ञानेश्वर जी ने नामदेव जी के यह कहते हुए पैर पकड़ लिए आज से आप मेरे गुरु। जो काम मेरा योग बल न कर सका ,वह आपके दो आंसुओं ने कर दिया। आप धन्य हैं गुरुवर।     

संदर्भ -सामिग्री :

(१ )https://www.youtube.com/watch?v=KPI9ArGP5S4


(२ )

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