गुरुवार, 14 सितंबर 2017

माथे की बिंदी आबरू का शाल है हिंदी , है देश मिरा भारत ,टकसाल है हिंदी।

हिंदी दिवस पर विशेष 

माथे की बिंदी आबरू का शाल है हिंदी ,

है देश मिरा  भारत ,टकसाल है हिंदी। 

है आरती का थाल मिरी  सम्पदा हिंदी ,

संपर्क की सांकल सभी है खोलती हिंदी। 

गुरुग्रंथ ,दशम ग्रन्थ भली रही हो कुरआन ,

एंजिल हो धम्मपद भले फिर चाहें पुराण ,

है शान में सबकी मिरी  लिखती रही जुबान ,

हैं सबके सब स्वजन मिरे ,सबकी मेरी हिंदी।

कर जोड़ के प्रणाम करे ,आपको हिंदी।  

है शान में सबकी मिरी , लिखती रही जुबान ,

शोभा में सबकी शान में, लिखती मिरी हिंदी। 

मैं तमाम हिंदी सेवकों को उनकी दिव्यता को प्रणाम करता हूँ। 

बुधवार, 13 सितंबर 2017

गायत्री मंत्र एक विहंगावलोकन

गायत्री मंत्र एक विहंगावलोकन

उपनयनसंस्कार के वक्त (वेदों का  अध्ययन शुरू करवाते वक्त )गुरु अथवा पिता गुरुकुल परम्परा के मुताबिक़ यह मंत्र छात्र के कान में कहता उच्चारता था ताकि वह विधिवत वेदों का अध्ययन आरम्भ कर सके। तमाम वेद वांग्मय का सार कहा गया है गायत्री  मंत्र को।

ऋग्वेद में सात छंद (मीटर )आते हैं इन्हीं में से एक है गायत्रीछन्द। इस छंद के तीन पाद (चरण या पैर ,फुट )हैं। प्रत्येक पाद में आठ अक्षर आते हैं। इस प्रकार गायत्री  छंद २४ अक्षरीय है।

सूर्य  की स्तुति में इसका पाठ किया जाता है इसीलिए इसे सावित्री -मंत्र भी कहा गया है। सवितृ  माने सावित्री यानी भगवान्  सूर्यदेव का गुणगायन है स्तुति है प्रार्थना है सूर्य देव से- वह हमें  सही मार्ग पर चलाये हमारी मेधा को प्रज्ञा ,बुद्धिमत्ता प्रदान करे।

अन्यान्य मंत्र भी गायत्री छंद-बद्ध किये गए हैं। अमूमन हरेक  देवता की  स्तुति में इस छंद में रचनाएं हैं।इनमें गायत्री मंत्र सब से ज्यादा लोकप्रिय है।

मंत्र पाठ हम  सभी जानते हैं इस प्रकार है :

ॐ भूर्भुवस्सुवः ,तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात

यहां ॐ परमात्मा को सम्बोधित है उसी का नाम है इसमें तीन अक्षर है अ ,उ ,म जो तीन उदगार (अभिव्यक्तियाँ )व्याहृतियाँ हैं। तीन Utterances हैंतीन  कथन हैं।

भूः भुवः सुवः   कथन हैं। उदगार हैं ये तीन जो ब्रह्माजी ने सृष्टि - रचना के क्षणों में अभिव्यक्त किये हैं उच्चारे हैं। इन्हें आध्यात्मिक ,रहस्यमय - ध्वनि -प्रतीक  भी समझा  गया  है।अनेकार्थ हैं इन ध्वनियों के जिनमें से एक है :

भूः मृत्यलोक ,भुवः पृथ्वी और सूर्य के बीच  के अंतरिक्ष तथा सुवः स्वर्ग के लिए आया है। इनसे व्युत्पन्न अर्थ भूः सत या सनातन अस्तित्व के लिए भुवः चित या ज्ञान के लिए और सुव: आनंद या ब्लिस के लिए आया है।यानी सच्चिदानंद। सत्यम ज्ञानम् अनंतं ।
अन्य अर्थों में सृष्टि की उत्पत्ति -पालना -और विलय (विनाश )लिए  हैं। जागृत ,स्वप्न एवं सुसुप्ति की तीनअवस्था का प्रपंच  स्थूल -सूक्ष्म -कारण तीन शरीर आदि भी अभिव्यक्त हुए हैं। गायत्री मन्त्र से पहले ये तीन उदगार ही अभिव्यक्त किए  जाते हैं।
ॐ वह परमात्मा भूः है ,भुवः है स्वः है। यानी वह एक ही सृष्टिकर्ता -पालनहार -और संहारकर्ता है सृष्टि का। वही सच्चिदानंद है वाहगुरु है अल्लाह है यहोवा है। वही सनातन अस्तित्व अनंत ज्ञान और कभी भी कम न होने वाला सदैव कायम आनंद है।गुरपरसादि  है।

वही तिरलोकी(त्रिलोक ) है जागृति स्वप्न एवं सुसुप्ति (डीप स्लीप स्टेट )का प्रपंच है। स्थूल -सूक्ष्म -कारण शरीर -त्रय है।

ये तीन उदगार ही गायत्री  के तीन पाद हैं पहला पाद है -तत्सवितुर्वरेण्यम दूसरा भर्गो देवस्य धीमहि और तीसरा यो न: प्रचोदयात।

ऐसा समझा जाता है की ॐ के  तीन अक्षर अकार (अ ),उकार (उ )और मकार (म ),तीन अभिव्यक्तियों ,भूः भुवः स्वः के उद्गम स्रोत हैं। इन तीन अक्षरों से ही गायत्रीछंद  के  तीन पाद बने हैं। प्रत्येक पाद से एक वेद निसृत है पहले से ऋग्वेद दूसरे से यजुर्वेद  तथा तीसरे से सामवेद  . इसीलिए गायत्री को वेदमाता भी कहा गया है वेद -जननी है गायत्री।     

प्रात : सूर्योदय से पहले और संध्या गौ -धूलि सूर्यके अस्ताचल गमन से पहले का वंदन है यह मन्त्र हम सभी के लिए।

मध्य दिवस काल (मिड - डे )में भी लोग सूर्य उपासना करते है। इसका बारम्बार उच्चारण संध्यावंदन का एक महत्वपूर्ण अंग है।

दो वाक्यों की निर्मिति भी माना जा सकता है इस मन्त्र को -पहला :हम ध्यान लगाते हैं प्रार्थी और प्रशंशक हैं उस सूर्य देव की स्वयं प्रकशित ख्यात भव्यता कांतिमान और बुद्धिमत्ता के  जो हमारे लिए सदैव ही वरेण्य है। मनभावन मनमोहक है।

सूर्यको प्रत्यक्ष देवता कहा गया है क्योंकि हम इसके प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं इसका आलोक वस्तुओं से लौटकर हमारी आँख को देखने की क्षमता प्रदान करता है। वैदिक संस्कृति सूर्यदेव की सहज उपासक रही आई है। उल्लास और प्रकाश और ताप को बिखेरने वाला देव माना गया है सूर्य देव को पृथ्वी पर जीवन और किसीभी प्रकार की वनस्पति का स्रोत भी सूर्यदेव ही माने समझे गए हैं। अज्ञान को दूर करता है इसका आलोक अज्ञान के अँधेरे  से हमें ज्ञान की उजास की ओर लाता है यह स्वयं प्रकाशित   देव।

दूसरा  वाक्य सीधा सरल प्रत्यक्ष बोध में आता है :'यह ही प्रचोदयात ' यो नः प्रचोदयात -यह हमें सही मार्ग पर ले चले हृदय गुहा के अन्धकार अज्ञान को भगा हमें सत्य की और ले जाकर हमारे अपने ब्रह्म स्वरूप का बोध कराये। हमारी मेधा को प्रज्ञा में बदले।

हमारा मन बाहरी प्रभावों उद्दीपनों की चपेट में आता है और अंतकरण से भी  विचार सरणी आती हैं।हमारे मन बुद्धि सोचने की शक्ति चित्त को  बाहरी प्रभावों से निकाल सही मार्ग की ओर ले चलें सूर्यदेव।

इस सृष्टि ब्रह्माण्ड पूरी  कायनात के संदर्भ में सूर्य देव को सृष्टा पालन करता कायम रखने वाले देव का दर्ज़ा प्राप्त है -प्रकाश और सौर ऊर्जा के  अभाव सचमुच में जीवन चुक जाए।

पृथ्वी  पर सारी वनस्पति और सारा दृश्य प्रपंच सूर्यदेव का ही प्राकट्य है। व्यक्त अभिव्यक्ति है। निर्गुण ब्रह्म का सगुण  रूप है सूर्यदेव। 

ताप ऊर्जा और प्रकार-अंतर  से बरसात लाने वाला भी सूर्य देव ही है। जब किसी देवता के प्रसादन  के लिए हवन करते हैं हव्य सामिग्री अग्नि के हवाले की जाती है।यही सूक्ष्म रूप अंतरित हो सूर्य की  किरणों पर सवार  हो सूर्य में  संग्रहित हो जाती है। कर्मफल दाता के बतौर सूर्य देव हमारे सद्कर्मों के फलस्वरूप वर्षा जल प्रदान करता है। जल ही जीवन है जल चक्र को सूर्य ही चलाये रहता है। भगवद्गीता में कहा गया है यज्ञ ही बरसा लाते हैं।इसीलिए सूर्य को गॉड का दर्ज़ा प्राप्त है। सूर्य को ब्रह्म होने का दृष्टा  बन सब कुछ साक्षी भाव से देखने का दर्ज़ा भी प्राप्त है मेरे तमाम विचारों का नियामक है सूर्य देव मेरी हृद गुफा में उसी के ज्ञान का प्रकाश मेरे ब्रह्मण (Brahman ब्रह्मन ) स्वरूप को उजागर करे। वही ज्ञान स्वरूप बुद्धिमता का देव सूर्य मेरे विचारों की  बुद्धि का कम्पास बने यही भाव है गायत्री का।
व्यवस्था सृष्टि का स्वरूप है बाहरी विक्षोभ सतही ही है। इसी अव्यवस्था के अंदर लय -ताल समरसता व्याप्त है। यही लयताल मेरा निजस्वरूप भी है। इस प्रकार  मार्ग और लक्ष्य दोनों एक साथ है गायत्री मन्त्र। हम उस सूर्यदेव का ध्यान लगाते हैं जो हमारा लक्ष्य है जो हमारे मन बुद्धि विचार सरणी को सन्मार्ग पर ले जाए। सद्कर्म कराये हमसे। ताकि मैं अपनी निजता को  आँज  लक्ष्य के निकटतर आ सकूं।वह मुझसे भिन्न कहाँ हैं मैं इस द्वैत को पहचान सकूं , मान सकूं यही अद्वैत वेदांत है। मेरे निज स्वरूप और ब्राह्मण में अद्वैत है द्वैत एक प्रतीति मात्र है मैं इसे समझ सकूं यही इस मन्त्र के निहितार्थ हैं।

ॐ शान्ति।

सगुण मीठो खांड़  सो,निर्गुण कड़वो नीम  ,

जा को गुरु जो परस दे ,ताहि प्रेम सो जीम।

जयश्रीकृष्ण।

विशेष ;प्रपंच शब्द मेरी इस अभिव्यक्ति में कई मर्तबा आया है। स्पस्ट कर दूँ माया के लिए प्रयुक्त किया जाता है यह शब्द।जो अनुपस्थित हो लेकिन अपने होने का बोध कराये वह माया है। जो सत्य प्रतीत हो , असत्य भी और दोनों  ही  नहीं हो वह माया है। जैसे स्वप्न एक प्रतीति है अल्पकाल की ,एक प्रपंच है जो जागने पर गायब हो जाता है वैसे ही जागृति भी एक प्रपंच है दीर्घकाल का (सत्तर अस्सी साल होती है आदमी की उम्र उसके बाद यह काया कहाँ चली जाती है यही तो माया है ,जो ट्रान्जेक्शनल रियलिटी ज़रूर है सत्य नहीं है लेकिन असत्य भी नहीं है क्योंकि मेरा  उसके साथ लेन  देन  है ट्रांसजेक्शन है।  उसी तरह सुसुप्ति (डीप स्लीप स्टेट )एक प्रपंच है कई मर्तबा बड़ी मस्त नींद आती है सुबह उठके हम कहते हैं रात बहुत अच्छी नींद आई। कौन किस्से यह कह रहा है कहने वाला कौन है ?सोया कौन था ?उठा कौन है ?यही प्रपंच है। सत्य वह है जो इन तीनों अवस्थाओं जागृति -स्वप्न -सुसुप्ति को आलोकित करता है साक्षी बनता है इन तीनों स्टेटस का ,वही मेरा असल स्वरूप है रीअल सेल्फ है ब्रह्मण है।मैं वही हूँ। 


मंगलवार, 12 सितंबर 2017

घर -दुआरे,मांगलिक अवसरों पर मंदिरों के बाहर रंगोली क्यों सजाई (बनाई )जाती है ?

घर -दुआरे,मांगलिक अवसरों पर मंदिरों  के बाहर  रंगोली क्यों सजाई (बनाई )जाती है ?

रंगोली घर-दुआरे बनाना श्री लक्ष्मी जी का आवाहन करना है। धनसंपदा वैभव की खजांची हैं विष्णुपत्नी श्रीलक्ष्मीजी। रंगोली पूजा का प्रतीक है। गृहलक्ष्मी का मतलब है आपका घर लक्ष्मी का प्रकट रूप है प्राकट्य है मनिफेस्टेशन है गॉडेस आफ प्रॉस्पेरिटी का।

रंगोली सजाने के लिए अमूमन चावल का आटा (राइस फ्लोर )ही काम में लिया जाता है जो चींटियों का अन्य सूक्ष्म जीवों का अंततय : आहार बनता है ,कीट जगत से आपको जोड़ती है रंगोली। इस पूरी कायनात में परस्पर सब एक दूसरे से सम्पर्कित हैं कनेक्टिड हैं।

ख़ास मांगलिक मौकों पर विशेष देवताओं के पूजन के निमित्त रंगोली सजाई जाती है। दीक्षांत समारोह महा -विद्यालयों का विश्व -विद्यालयों का रंगोली का साक्षी बनता है -बिस्मिल्ला -खां  की शहनाई के स्वर और रंगोली की सजावट मौहोल को चार चाँद लगा देती है। शोभायात्रा इसी मांगलिक ध्वनि के साथ शुरू होती है।

दीगर है की रंगोली आपकी कलात्मकता की भी एक स -शक्त अभिव्यक्ति है। रंगोली जोश -औ - खरोश और पूजा दोनों का प्रतीक है। दीपावली ,पोंगल आदि पर्वों पर रंगोली की शान औ सजावट देखते ही बनती है।

स्वास्तिक डिज़ाइन के अपने निहितार्थ हैं रंगोली में -एक तरफ यह ओंकार का प्रतीक है दूसरी और कालचक्र का। स्वास्तिक चक्र की एक भुजा ऊपर जाती है तो एक नीचे ,एक दक्षिणांगी रहती है तो एक वामांगी। ऊर्ध्वगामी भुजा सतयुग और अधोगामी द्वापर(भौतिक  द्वन्द्व डायलेक्टिकल मटीरियलिज़्म ) को दर्शाती है वामांगी -कलयुग का प्रतीक है और दक्षिणांगी त्रेता का।

रंगोली में ज्यामितीय आकार यंत्रों को दर्शाते हैं जो इतर - देवों के पूजन हेतु हैं। 

पूजा अर्चना के दौरान घर -मंदिर आदि में शंख क्यों बजाया जाता है ?

पूजा अर्चना के दौरान घर -मंदिर आदि में शंख क्यों बजाया जाता है ?

शंख बजाने से कथा शुरूहोने की और फिर संपन्न होने पर आरती होने की इत्तला हो जाती है। संचार का एक ज़रिया भी रहा है शंख ध्वनि। महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले सब अपने अपने शंख बजाकर युद्धारम्भ की खबर देते हैं। अलबत्ता शंख ध्वनि से तकरीबन आधा - किलोमीटर दायरे में रोगकारकों का विषाणुओं का नाश होता है। शंख ध्वनि मांगलिक समझी गई है। जब कोई बुजुर्ग अपनी उम्र पूरी करके इस दुनिया से उठता है तब भी शंख बजाया जाता है। चंवर भी झला जाता है अर्थी के गिर्द।

शंखध्वनि चित्तशामक का काम करती है शांत  करती है चित्त को फलतय : मन भक्ति उन्मुख हो जाता है। 

नदियों में गंगा का शीर्ष स्थान क्यों ?


नदियों में गंगा का शीर्ष स्थान क्यों ?

जबकि विश्वकी सभी नदियाँ जीवन और संस्कृतियों का पोषण करती आईं हैं गंगा का अपना वैशिठ्य रहा आया है। कहा जाता है -एक बार ब्रह्माजी नारायण (महा-विष्णु )के चरण धौ रहे थे ,पाद प्रक्षालन कर रहे थे ,यही विष्णु -चरणोदक स्वर्ग की नदी बन बहने लगा। उसी समय पृथ्वी पर राजा भागीरथ अपने पुरखों की भस्म के परि -शोधन  ,उनकी ऐशिज  को सेंकटिफ़ाइ हेतु  तप कर रहे थे,फलस्वरूप गंगा जी भू -मुखी हो वेगवती धारा के साथ पृथ्वी की और बढ़ने लगीं ,इस आवेग से पृथ्वी दो फाड़ हो सकती थी ,लिहाज़ा वेव -ब्रेकर्स के तौर पर शिव ने इसे अपनी जटाओं की ओर  मोड़ा ,प्रवेग को शांत करके पृथ्वी की और पुन :मोड़ दिया।

लिहाज़ा रजोगुण प्रधान ब्रह्माजी ,सतोगुणप्रधान विष्णु और तमोगुण के स्वामी शिव का स्पर्श गंगे को मिला है। इसके जल को गंगा जल कहा गया है जिसमें घुलित ऑक्सीजन की मात्रा गौ -मुख से निकासी होते ही अधिकतम रहती है इसीलिए गंगा जल यहां स्रोत से लिया गया कभी सड़ता नहीं है। भले आज हमारी करतूतों के चलते कहानी और है लेकिन श्रद्धा और आस्था चुकी नहीं है भले नदियाँ तो क्या दुनिया भर  के समुन्दर भी स्वत :शोधन आज नहीं कर पा रहें हैं आइल स्पिल्स के चलते। तमाम और कारक हैं जिनकी चर्चा करना हमारा मंतव्य यहां नहीं है।

"आदि -शंकराचार्य" अपने  "गंगा -स्त्रोत्रं" में कहते हैं -जो एक मर्तबा भी गंगा में डुबकी लगा लेता है उसे फिर दोबारा माँ के गर्भ में जठराग्नि में लौटकर उलटे लटकना नहीं पड़ता -पुनरपि जन्मम पुनरपि मरणम ,पुनरपि जननी जठरेशयनम -से वह मुक्त हो जाता है।

"आर्य" यहीं इंडो  -गेंजेटिक प्लेन्स में रहे पनपें  हैं विकसें हैं। काशी -प्रयाग -हरिद्वार -ऋषिकेश से लेकर रुद्रप्रयाग ,कर्णप्रयाग आदि उत्तराखंड के अनेक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र यहीं पनपें हैं जहां संस्कृति का लगातार पल्लवन हुआ है।

गंगा ज्ञान का प्रतीक है जो गुरु के मस्तिष्क से निसृत होकर शिष्य परम्परा की और आया है। ज्ञान की सतत प्रवहमान धारा है गंगा महज नदी नहीं है।

अनेक ऋषियों का तप फल गंगा जल लिए हुए है। "शब्द" से गंगा -जल का अभिषेक हुआ है। यह आकस्मिक नहीं है उत्तर भारत के तमाम लोग एक मर्तबा रामेश्वरम के समुन्दर में डुबकी लगाना चाहते हैं तो दक्षिण के हर की पौड़ी - हरिद्वार का रुख करते हैं। हर कोई गंगासागर में भी स्नान करना चाहता है जो उत्तरभारत को बंगाल की खाड़ी  और दक्षिण के समुन्दर से जोड़ता है। इसप्रकार गंगा हमारी सर्व -समावेशी सांस्कृतक धारा का सशक्त न्यूक्लियस बनी हुई है।यूं ही नहीं गया गया है -गंगा मेरी माँ का नाम बाप का नाम हिमालय

https://www.youtube.com/watch?v=Donn6OgYV-g

सोमवार, 11 सितंबर 2017

पुजारी ईश की आरती उतारने के बाद आरती का थाल भक्तों तक लाता है,इसका क्या मतलब होता है ?

पुजारी ईश की आरती उतारने के बाद आरती का थाल भक्तों तक लाता है,इसका क्या मतलब होता है ?

अक्सर पूजा के प्रकार के अनुसार दीपशिखा एक से लेकर पांच लौ वाली भी होती है। जो पांच कोशों का प्रतीक है (Five sheaths of life force).दरसल जो शिखा (फ्लेम ,दीप  की लौ -ज्योति )ईश को आलोकित कर चुकी है उसका संपर्क ईश से हो चुका है। अब वह साधारण ज्योति नहीं रही है जैसे ईश्वर पर अर्पण करने के बाद प्रसाद में अर्पित खाद्य सामिग्री अब प्रसाद ही कहलाती है केला अब मात्र केला नहीं रहा ,प्रसाद (परसादा )बन गया। वैसे ही यह ज्योत अब आशीष प्राप्त ज्योत है ,भक्त इसके ऊपर अपने हाथों की हथेली पलांश को रखता है फिर इसका स्पर्श अपनी आँखों से कराता है।ऐसा करके वह अनुग्रह प्राप्त करता है ईश की।  पुजारी यहां गुरु समान ज्ञान उजास कर मय -ईश- अर्पित- ज्योत के रागद्वेष ,ईरखा (ईर्षा )आदि नकारात्मक वृतियों का नास कर रहा है। यही निहितार्थ हैं भक्तों तक आरती लाने का। 

हाँ एक बात और अर्थ ,पुष्पम पत्रं के रूप में हम जो भी कुछ ईश को अर्पित करते हैं। वह उसे स्वीकारता है। ये नहीं है कि ईश्वर को कुछ पदार्थ चाहिए वह तो आपकी मुक्ति तनमन धन समर्पण ,का प्रतीक है रुपया पैसा डॉलर जो भी आप समर्पित करते हैं इस सम -अर्पण  भाव से आप अपने अहम (अहंता भाव से )मुक्त होते हैं। ईश्वर तो स्वयं दाता है अलबत्ता संस्था को चलाये रखने उसके रख रखाव के लिए अर्थ (पदार्थ )भी चाहिए। फिर आपके पास अपना है क्या सब कुछ तो उसी का दिया हुआ है। इसीलिए कहा गया -तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा। 

रविवार, 10 सितंबर 2017

"पूजा" के बाद"आरती "करने के निहितार्थ क्या हैं ?क्यों की जाती है किसी भी पूजा के सम्पन्न होने पर आराध्यदेव की आरती?

"पूजा" के बाद"आरती "करने के निहितार्थ क्या हैं ?क्यों की जाती है किसी भी पूजा के सम्पन्न होने पर आराध्यदेव की आरती?

ईष्ट की प्रतिमा के गिर्द प्रज्वलित दीप -थाल को घुमाने का एक कारण यह रहा आया है आज भी दक्षिण  भारत के अधिकाँश मंदिरों के गर्भगृह में बिजली का बल्ब नहीं जलाया जाता है। मात्र दीपक का धीमा प्रकाश ईश को रोशन करता है। उसके आभूषणों की दमक और कांति हम तक पहुँचती है। पुजारी आरती उतारता है ईश को समूचा साफ़ साफ़ आलोकित करने के लिए ताकि उसका दर्शन ठीक से हो सके सर्वांश  में।

गर्भ गृह हमारे हृदय की गुफा की तरह हैं जहां एक साथ ईश और हमारे अज्ञान का अन्धकार है। आरती में कपूर जलाये जाने का एक विशेष अर्थ यह रहता है -कपूर पूरा जल जाता है। दहन सौ फीसद होता है। शेष कुछ नहीं बचता कार्बन (कालिख ),के रूप में। हमारा अज्ञान नष्ट हो अपने ब्रह्म स्वरूप को निरंजन (बिना कालिख)होने को हम जान सकें। आखिरकार एक ही चेतन परिव्याप्त है सृष्टि में। करता और करतार एक ही हैं। किर्येटर एन्ड किरयेशन आर वन एन्ड देअर इज़ नो सेकिंड। देअर इस आनली गॉड।

पूजा आरती आदि भले द्वैत का बोध कराये। इसकी  परिणति अद्वैत में ही होती है। बस भांडा साफ़ रहे हमारा मन स्वच्छ रहे। पूजा अर्चना शुद्धिकरण का एक ज़रिया भर है। मंज़िल अद्वैत ही है जहां पूजित और पुजारी दो नहीं हैं। दो की जस्ट अपियरेन्स है।