गुरुवार, 24 सितंबर 2015

रावण रजो गुण (एक्शन ) का प्रतीक है कुम्भकरण तमोगुण (अज्ञान,घोर -प्रमाद, आलस्य निद्रा)का प्रतीक है और विभीषण सतो गुण का। यही सत्व उसे भगवान राम की शरण में ले आता है। कंस रजो और तमो दोनों का मिश्र है।


शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

मैं और मोर तोर ते माया जेहि बस कीन्हें जीव निकाया।

ये कुब्जा कोई औरत नहीं है हमारी बुद्धि ही कुब्जा हो जाती है रजो और तमो गुणों के प्रभाव से। जब हम कृष्ण से विमुख होकर कंस से अभिमुख हो जाते हैं तब हमारी बुद्धि कुब्जा हो जाती है। भले भागवद्पुराण के दशम स्कंध में कुब्जा की कथा है लेकिन आध्यात्मिक अर्थों में कुब्जा और कोई नहीं मंथरा के संसर्ग से होने वाली कैकई की  कुबुद्धि है कुब्जा। 

कुब्जा का एक अर्थ है वक्र ,बाँकी ,टेढ़ी ,उलटी चाल चलने वाली।सदैव ही उलटा सोचने वाली बुद्धि ही कुब्जा है।

कथा है मथुरा के बाज़ार से कृष्ण और दाऊ  जी की जोड़ी गुज़रती है। कृष्ण के नथुनों में चंदन की सुवास प्रवेश करती हैभाव संसिक्त हो कृष्ण बलराम से कहते हैं दाऊ ये सुवास कहाँ  से आ रही है पास आकर देखते हैं एक स्त्री चांदी के पात्र में चंदन घिसा लिए बैठी है। यह स्त्री कुब्जा है क्योंकि इसको कुब्ब निकला हुआ है हंच-बेक है ये महिला जो कंस की दासी है नित्य उसके तमाम शरीर पर चंदन का लेप करती है। उसी के संसर्ग से इसकी बुद्धि कुब्जा हो गई है -रजो और तमो गुणों के प्रभाव क्षेत्र में कैद हो गई है।

कृष्ण इस महिला से पूछते हैं :हे  सुंदरी आप कौन हैं। महिला अभिभूत हो जाती है कहती है आपने मुझे सुंदरी कहा। सुंदरी तो तुम हो ही -कन्हैया बोले। मुझे तो आज तक किसी ने सुंदरी कहके सम्बोधित नहीं किया सब मुझे कुब्जा कहके मेरा मुंह बिराते हैं। वे लोग तुम्हारा शरीर देखते हैं मैं तुम्हारी आत्मा देख रहा हूँ। मेरा तुम्हारा जन्मों का नाता है। हाँ भगवन मुझे भी आपको देखकर यही लगता है मैं कई जन्मों से आपका ही इंतज़ार कर रही थी। बोले कृष्ण आज हमें चन्दन लगा दो। कुब्जा दोनों के लिए चांदी की चौकी बिछाती है और बीच बाज़ार में दोनों के माथे पे तिलक लगाती है कपोलों पर चंदन से फूल बनाती है।

भगवान खड़े होकर आहिस्ता से अपना एक पैर उसके एक पैर पर रखते है और अपनी दो उंगलिया उसकी ठोड़ी के नीचे रखकर बस एक हल्का सा झटका देते हैं। कुब्जा की झुकी हुई कमर सीधी हो जाती है भगवान के स्पर्श से उसके सब पाप शाप मिट जाते हैं वह परमसुंदरी के रूप में खिल उठती है।

कृष्ण के संपर्क में आकर अर्थात शुद्धसत्व से सम्पर्कित होने पर वह रजो और तमो गुणों के प्रभाव से मुक्त हो जाती है। हम इस त्रिगुणात्मक माया के जाल में ही फंसे रहते हैं -सतो ,रजो और तमो गुण -हर क्षण हमें  अपनी गिरिफ्त में लिए रहते हैं। ये ही असली करता हैं कर्म के। गीता में कहा गया है गुण ही गुणों को बरतते हैं अर्थात ये त्रिगुणात्मक प्रकृति ही करता है हम अपने आपको करता मान कर्तित्व अभिमान में आ जाते हैं। मेरा कर्म है ये मैंने किया है ये। ये मेरा है। ये मैं और मेरा ही तो माया है।

मैं और मोर तोर ते माया 

जेहि बस कीन्हें  जीव निकाया। 

हमारे भीतर हर क्षण किसी एक गुण  का प्राबल्य बना रहता है कोई एक गुण बाकी दो को दबाये हमें  दबोच लेता है  बस वैसा ही कर्म हो जाता है।

रावण रजो गुण (एक्शन ) का प्रतीक है कुम्भकरण तमोगुण (अज्ञान,घोर -प्रमाद, आलस्य निद्रा)का प्रतीक है और विभीषण सतो गुण का। यही सत्व उसे भगवान राम की शरण में ले आता है। कंस रजो और तमो दोनों का मिश्र है।

Krishna Kubja Leela | Hunchbacked Woman Salvation

https://www.youtube.com/watch?v=nO_h6AESdfE


Courtesy: SagarArts Krishna, the supreme personality of God, tests Kubja and turns her into beautiful lady...  

ये प्राईवेट मामला क्या होता है ?

ये प्राईवेट मामला क्या होता है ?

जब कभी भी आउल बाबा और मायनो टोनिया की बात होती है सभी टोनियावी चिरकुट कहते हैं -ये बाबा और मम्मी जी का प्राइवेट मामला है। चाहे फिर बात इलाज़ से जुड़ी  हो या मटरगश्ती से ,या फिर तफरी से।आज की तारीख में बाबा  का अतापता ,बाबा के वेअरअबाउट्स को लेकर बड़ा भ्रम  फैलाया जा रहा है। हमने अच्छा नहीं लग रहा है ये सब। कुछ प्रवक्ता किस्म के लोग जिन्हें चाकर कहा जाता है  नाहक बिला वजह झूठ बोल रहे हैं, जिसकी बिलकुल आवश्यकता नहीं हैं। साफ़ साफ़ कहो अपने बच्चों से मिलने गए हैं।झूठ के पाँव नहीं होते एक को छिपाने के लिए भैया फिर दूसरा बोलना पड़ता है। कहा जा रहा है बाबा एक आलमी कान्फरेन्स में शिरकत करने अमरीका गए हैं। यहां फिलवक्त ऐसी कोई कांफ्रेंस नहीं है। 

बाबा अपने गुरु भोपाली बाज़ीगर से ही कुछ सीख लें। आपने ने प्रेम भी किया प्रेमविवाह भी। सबने एप्रीशिएट  किया  मुबारक बाद दी। बाबा क्यों वंचित रहें। भले दैहिक संबंधों की पूर्ती करने कहीं गए हों। अभिसार यहां भारत में भी वर्जित नहीं है उसके लिए अमरीका जाने की कहाँ ज़रुरत है।  


The annual event got over in July; so where is Rahul Gandhi?
By Sujeet Rajan
Rahul-Gandhi
NEW YORK: The Congress Party is lying about Rahul Gandhi’s whereabouts in the United States, if indeed he is here in the country on a visit: the vice-president of the opposition party in India, the Indian National Congress, is not listed for any global meet or the ‘Weekend with Charlie Rose’ conference in Aspen, Colorado, located in the Rocky Mountains.
The Press Trust of India reported earlier today that Gandhi had left India to attend the ‘Weekend with Charlie Rose’ conference at Aspen, Colorado, as per Congress spokesperson Randeep Singh Surjewala.
“Rahul Gandhi is travelling to Aspen, US on a short visit to attend a conference. ‘Weekend with Charlie Rose’ is a conference where thought leaders from different walks of life like politics, finance, technology, media, medicine, sports etc. gather to deliberate on multiple issues,” Surjewala was quoted as saying by PTI.
Surjewala was responding to the Bharatiya Janata Party’s claims that Congress was forced to send Gandhi away from the country as their allies want him out of Bihar poll campaign.
BJP spokesman Sambit Patra took a dig at Rahul Gandhi over his visit to the US, saying it may be a “forced vacation” as, according to him, allies JD(U) and RJD wanted him away, said reports.
“It appears that the feedback the leaders of grand alliance got from Bihar made them call Congress to send him on a forced vacation because his stay anywhere near Bihar is going to harm their electoral chances,” Patra was quoted as saying.
Calls to The Aspen Institute, which has its headquarters in Washington, DC, but holds events also in Aspen, New York City and San Francisco throughout the year, revealed that the annual ‘Weekend with Charlie Rose’ conference got over in the first week of July this year.
Since its inception, in 2005, the festival takes place between the dates of June 25-July 4, according to Karen Peterson, Registrar and Conference Manager, Aspen Ideas Festival, which is what the annual event is officially known as.
This year, the conference’s theme was: ‘Smart Solutions to the World’s Toughest Challenges.’ Presented by the Aspen Institute in partnership with The Atlantic magazine, the Aspen Ideas Festival is the nation’s premier, public gathering place for leaders from around the globe and across many disciplines to present and discuss ideas and challenging issues. Some 350 presenters, 200 sessions, and 3,000 attendees comprised the annual festival this year, in July.
“I don’t see Rahul Gandhi listed as a speaker in any Aspen related event, public or private, in the past or in the near future,” said Petersen in an interview to The American Bazaar.
Asked if Rose himself selects the guests for the annual meet, Petersen said that though in the past Rose has been a featured speaker at the event, the last time he himself participated at the annual meet, was in 2012.
Petersen also checked other Aspen events where Rahul Gandhi might be a speaker, but could not find his name in the database.
“There is nobody by that name featured in any Aspen event,” said Petersen.
The list of public events in the town of Aspen which has a population of over 6,000, reveals that the major events listed for the months of September and October are a film festival and other entertainment related programs.
George Abraham, chairman of a faction of the Indian National Overseas Congress, and based in New York, in an interview to The American Bazaar, said that he had “not been notified” of any visit by Rahul Gandhi to the United States.
“When I met Rahul Gandhi in October of last year in New Delhi, he had told me he was keen to meet the Indian Diaspora here. But we have not been notified of anything. We wanted him to come here to talk of the Congress ideology, but this is anyway not a good time to visit the US with prime minister Narendra Modi also on a visit,” said Abraham.
Asked if it was disturbing to him that the whereabouts of Gandhi is again in question, following a controversial and mysterious almost two months’ sabbatical he took earlier this year, Abraham said that he is “not disturbed” by it.
“Rahul Gandhi does not have any official responsibilities in India, so he could be here on a private visit,” said Abraham.
But asked why the Congress party would then in that case not clarify that, Abraham declined to comment.
Lavika Bhagat Singh, the President of the officially recognized Indian National Overseas Congress, and based in the Washington, DC, area, said in a phone interview that she was not aware if Rahul Gandhi was in the United States.
“I don’t know,” said Singh.
The question is: where is Rahul Gandhi?
If indeed he is in the ski resort of Aspen, one of the wealthiest real estate destinations in the US, what is he doing? If he is on a private visit, why would the Congress not disclose that?
(Sujeet Rajan is Editor-in-Chief, The American Bazaar)

ये कुब्जा कोई औरत नहीं है हमारी बुद्धि ही कुब्जा हो जाती है रजो और तमो गुणों के प्रभाव से

ये कुब्जा कोई औरत नहीं है हमारी बुद्धि ही कुब्जा हो जाती है रजो और तमो गुणों के प्रभाव से। जब हम कृष्ण से विमुख होकर कंस से अभिमुख हो जाते हैं तब हमारी बुद्धि कुब्जा हो जाती है। भले भागवद्पुराण के दशम स्कंध में कुब्जा की कथा है लेकिन आध्यात्मिक अर्थों में कुब्जा और कोई नहीं मंथरा के संसर्ग से होने वाली कैकई की  कुबुद्धि है कुब्जा।

कुब्जा का एक अर्थ है वक्र ,बाँकी ,टेढ़ी ,उलटी चाल चलने वाली।

कथा है मथुरा के बाज़ार से कृष्ण और दाऊ  जी की जोड़ी गुज़रती है। कृष्ण के नथुनों में चंदन की सुवास प्रवेश करती हैभाव संसिक्त हो कृष्ण बलराम से कहते हैं दाऊ ये सुवास कहाँ  से आ रही है पास आकर देखते हैं एक स्त्री चांदी के पात्र में चंदन घिसा लिए बैठी है। यह स्त्री कुब्जा है क्योंकि इसको कुब्ब निकला हुआ है हंच-बेक है ये महिला जो कंस की दासी है नित्य उसके तमाम शरीर पर चंदन का लेप करती है। उसी के संसर्ग से इसकी बुद्धि कुब्जा हो गई है -रजो और तमो गुणों के प्रभाव क्षेत्र में कैद हो गई है।

कृष्ण इस महिला से पूछते हैं :हे  सुंदरी आप कौन हैं। महिला अभिभूत हो जाती है कहती है आपने मुझे सुंदरी कहा। सुंदरी तो तुम हो ही -कन्हैया बोले। मुझे तो आज तक किसी ने सुंदरी कहके सम्बोधित नहीं किया सब मुझे कुब्जा कहके मेरा मुंह बिराते हैं। वे लोग तुम्हारा शरीर देखते हैं मैं तुम्हारी आत्मा देख रहा हूँ। मेरा तुम्हारा जन्मों का नाता है। हाँ भगवन मुझे भी आपको देखकर यही लगता है मैं कई जन्मों से आपका ही इंतज़ार कर रही थी। बोले कृष्ण आज हमें चन्दन लगा दो। कुब्जा दोनों के लिए चांदी की चौकी बिछाती है और बीच बाज़ार में दोनों के माथे पे तिलक लगाती है कपोलों पर चंदन से फूल बनाती है।

भगवान खड़े होकर आहिस्ता से अपना एक पैर उसके एक पैर पर रखते है और अपनी दो उंगलिया उसकी ठोड़ी के नीचे रखकर बस एक हल्का सा झटका देते हैं। कुब्जा की झुकी हुई कमर सीधी हो जाती है भगवान के स्पर्श से उसके सब पाप शाप मिट जाते हैं वह परमसुंदरी के रूप में खिल उठती है।

कृष्ण के संपर्क में आकर अर्थात शुद्धसत्व से सम्पर्कित होने पर वह रजो और तमो गुणों के प्रभाव से मुक्त हो जाती है। हम इस त्रिगुणात्मक माया के जाल में ही फंसे रहते हैं -सतो ,रजो और तमो गुण -हर क्षण हमें  अपनी गिरिफ्त में लिए रहते हैं। ये ही असली करता हैं कर्म के। गीता में कहा गया है गुण ही गुणों को बरतते हैं अर्थात ये त्रिगुणात्मक प्रकृति ही करता है हम अपने आपको करता मान कर्तित्व अभिमान में आ जाते हैं। मेरा कर्म है ये मैंने किया है ये। ये मेरा है। ये मैं और मेरा ही तो माया है।

मैं और मोर तोर ते माया 

जेहि बस कीन्हें  जीव निकाया। 

हमारे भीतर हर क्षण किसी एक गुण  का प्राबल्य बना रहता है कोई एक गुण बाकी दो को दबाये हमने दबोच लेता है  बस वैसा ही कर्म हो जाता है।

रावण रजो गुण (एक्शन ) का प्रतीक है कुम्भकरण तमोगुण (अज्ञान,घोर -प्रमाद, आलस्य निद्रा)का प्रतीक है और विभीषण सतो गुण का। यही सत्व उसे भगवान राम की शरण में ले आता है। कंस रजो और तमो दोनों का मिश्र है।

Krishna Kubja Leela | Hunchbacked Woman Salvation

https://www.youtube.com/watch?v=nO_h6AESdfE


Courtesy: SagarArts Krishna, the supreme personality of God, tests Kubja and turns her into beautiful lady...  

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

एक घड़ी आधी घड़ी ,आधी की पुनि आध , तुलसी संगत साधु की ,काटे कोटि अपराध

सब संस्कारों की बात है भैया -जैसा बीज वैसा फल। कुसंग का रंग जल्दी चढ़ता है उतरता देर से है। कुसंग एक पल का भी विश्वामित्र की तपस्या का भंग कर देता है। इसलिए तुलसी बाबा  ने कहा-

एक घड़ी आधी घड़ी ,आधी की पुनि आध ,

तुलसी संगत साधु  की ,काटे कोटि अपराध।


महाकवि तुलसी दास जी कहते हैं साधु पुरुष की संगत से हमारे अनंत कोटि जन्मों के अपराध नष्ट हो जाते हैं इसके बाद सिर्फ प्रारब्ध भोगना ही शेष रह जाता है व्यक्ति पूर्व जन्म के पापकर्मों के फल से यानी संचित कर्मों से मुक्त हो जाता है। अब करने को क्रियमाण कर्म (वह कर्म जो तुम अब कर रहे हो जिन्हें आगामी कर्म भी कहा  जाता है क्योंकि इनका फल आगे के जन्मों में मिलता है )और प्रारब्श कर्मफल ही शेष रह जाता है।

एक घड़ी  में चौबीस मिनिट बतलाये गए हैं  . आधी में हुए बारह और आधी की भी आधी बोले तो हुए छ :मिनिट। सुसंग का रंग देर से चढ़ा न। और कुसंग तो एक पल का ही बहुत बुरा फल लाता है। घड़ी ,पल छिन सब सुसंग में जाए यही वर्णाश्रम व्यवस्था के छात्र धर्म का सही निर्वाह है। दारु तो कोई भी पी सकता है समुद्र मंथन में लक्ष्मी के बाद वारुणी (दारु )ही निकली थी जिसे देवताओं ने लेने से इंकार कर दिया। उसे राक्षस सहर्ष ले गए। 

राजा परीक्षित ने जब कलियुग (एक छद्म राजा के वेश में) को एक गाय और वृषभ (बैल ,सांड ) को बे -तरह बे -रहमी से मारते हुए देखा तो उसे अपने राज्य से बाहर निकलने का दंड दिया माफ़ी मांगने पर क्षमा करते   क्षमा दान देते हुए कहा -जहां पर जूआ खेला जाता है ,शराब पी जाती है या फिर सोना रखा जाता है वहां पर तुम रह सकते हो। उनके राज्य में ऐसा कोई स्थान नहीं था ,मदवि में कहाँ से आ गया ? 

एक प्रतिक्रिया :पोस्ट दया लाठिया की पर 

एकता में बल है। दूसरी छात्राएं एक क्यों नही होती। जो छात्रा शराब पी रही हो उसको पकड़कर मदवि प्रशासन को सौंप दिया जाये। दो-चार सौंपी समस्या खत्म।

श्याम रंग में रंगी चुनरिया ,अब रंग दूजो भावे न ,जिन नैनं में श्याम बसें हैं और दूसरो आवे न

क्या है रास ?कौन है गोपी ?

आत्मा और परमात्मा का मिलन ही रास है। यह स्त्री और पुरुष का साधारण मिलन नहीं  है। न ही गोपी कोई स्त्री है। जब व्यक्ति अपनी  दसों इन्द्रियों (पांच ज्ञानेन्द्रियाँ आँख ,कान ,नाक ,मुख और चमड़ी ,पांच कर्मेंद्रियां हाथ ,पाँव ,मुख ,जननेंद्रियां तथा  गुदा   )से कृष्ण रस का पान करने लगता है वह गोपी हो जाता है। गोपी एक भाव है। स्त्री या पुरुष नहीं है गोपी। गो का एक अर्थ है समस्त इन्द्रियाँ और पी का अर्थ है पान करना। 

महाभाव श्रीजी (श्री राधारानी )हैं।इनकी अनुमति के बिना महारास हो ही नहीं सकता। कृष्ण और श्रीराधा जी का उच्छल प्रेम वेगवती यमुना की धारा है यही महारास है।ब्रज के संतों ने प्रेम को पांचवां पुरुषार्थ कहा है। धर्म ,अर्थ ,काम और मोक्ष अन्य चार पुरुषार्थ कहे गए हैं।   

रास से पहले रासरचैया श्रीभगवानकृष्ण  अपनी योगमाया (अंतरंगा शक्ति ,इंटरनल एनर्जी )से शरद ऋतु का निर्माण करते हैं। फिर अपने शयन कक्ष के गवाक्ष खोलके देखते हैं तो खिड़की के बाहर गगन  में पूर्ण चन्द्र मुस्का रहा है। कृष्ण निधिवन के लिए अनुगमन करते हैं। घास के बिछौने पर अपना पीताम्बर बिछाते हैं। उसपे बंशी को विराजमान करके उसकी स्तुति  करते हैं।फिर कहतें हैं देख वंशी मैं ने तेरी रातदिन कितनी सेवा करता हूँ पर तू आज तक मेरे किसी काम नहीं आई। वंशी बोली वो कैसे। बोले भगवान देख में तुझे आपने दोनों हाथन की सेज बनाके  सुलाता हूँ अपने अधरों का तकिया तेरे सिरहाने  लगाता हूँ अपनी उँगलियों से तेरे चरण दबाता हूँ वंशी बजाते हुए इसलिए आज तू मेरा एक काम कर गोपियन के मणिरूपी मन को चुरा ला।   

बोली वंशी -चोरी के अलावा भी तुम्हें कछु काम है कन्हु। चलो इतनी मनुहार करते हो तो जाती हूँ। वंशी ने अपना काम पूरा किया है। गोपियाँ वंशीवट के ढिंग (के गिर्द ) पधारी हैं। भगवान उनसे कहते हैं तुम यहां आधी रात को क्या कर रही हो क्या तुम्हें अपने बछिया बछड़न का रम्भाने का स्वर सुनाई नहीं देता है अपने नौनिहालों की याद नहीं आती जिन्हें तुम घर पर छोड़ यहां चली आई हो। कितने भी दुस्शील सही हैं तो वह तुम्हारे पति ही जिन्हें छोड़ तुम अभिसार को निकल आई हो। लौट जाओ और अपने पातिव्रत धर्म का पालन करो। 

गोपियाँ कहतीं हैं आप निपट छलिया हो पहले बुलावा भेजते  अब कहते हो लौट जाओ। अब हम लौटके कहाँ जाएँ। 
हम सब अपने सब विषयों का त्याग कर चुकीं हैं। इन्द्रियों के पांच विषय हैं रूप ,रस,गंध और स्वाद और स्पर्श। अब हमें आपके अलावा कोई विषय बाँध ही नहीं सकता। 

रूप हमारी आँखों में आपका बसा है वही हम नित्य देखतीं हैं ,हमारी नासिका के नथुनों में तुम्हारे चरण कमलो पर शोभित तुलसी की गंध ही रची बसी हुई है  ,कान तुम्हारा ही संकीर्तन तुम्हारे ही यशोगान सुनते हैं। स्पर्श भी प्रभु हमने सिर्फ आपका ही किया है रोम रोम से। 

इस भौतिक संसार से तो हमारा सम्बन्ध चित्र जैसा है जो बनता है और काल के हाथों कालान्तर में बिगड़ जाता है। हमारा आपका संबंध तो शाश्वत  है।हम आपकी ही  परमाणु वत अंश है। प्रभु आपकी लीला अपरम्पार है आप सब धर्मों के मर्मज्ञ हैं हम ठहरीं भोली भाली बिरज की ग्वालिन। हमें आपकी बातें समझ नहीं आती। 

श्याम रंग में रंगी चुनरिया ,अब रंग दूजो भावे न ,जिन नैनं में श्याम बसें  हैं और दूसरो आवे न। 

अब हम जाएं तो कहाँ जाएं इतना दैन्य देख भगवान प्रसन्न हो जाते हैं और नाचने लगते हैं हर गोपी के संग। जितनी गोपिन उतने कृष्ण योगमाया से भगवान रच देते हैं। 


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  1. 0098 KRISHNA STORY - RAS LEELA WITH GOPIKAS

    • 4 years ago
    • 185,294 views
    Krishna now takes multiple forms and plays RAS LEELA with each Gopika including Radhaji. See it in Ramanand Sagar's ...

https://www.youtube.com/watch?v=f03O0kjbPu4


0098 KRISHNA STORY - RAS LEELA WITH GOPIKAS