गुरुवार, 25 सितंबर 2014

तुलसी भरोसे राम के रह्यो खाट पे सोय

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Tulsidas Painting by Indra Sharma. 

तुलसी भरोसे राम के रह्यो खाट पे सोय,

अनहोनी होनी नहिं ,होनी होय सो होय। 

राम के भरोसे कर्म करके निश्चिन्त हो जाओ। अ -कर्मय  होकर सो नहीं 

जाओ। कर्म बंधन में जो बांधता नहीं है वही  राम के भरोसे किया 

गया 

कर्म है (निष्काम कर्म है )अगर कर्ता भाव रखोगे तो  बंधन में 

आ   जाओगे। निश्चिन्त होकर सो नहीं सकोगे। 

अंतस्थ में शान्ति रखो और फिर घोड़े बचके सो जाओ। खाट पे इस तरह 

वही सोयेगा जो निश्चिंत होगा। मैं  ने अपनी तरफ से सौ फ़ीसदी कर दिया 

आगे राम जाने। यहां दीक्षा कर्म की देते हैं महाकवि तुलसी। बिना परिश्रम 

के ,बिना कर्म के तो शरीर का निर्वाह भी नहीं होगा। 

बिना कर्म के क्षुधा का निवारण कैसे होगा ?अर्थात कर्म करो उसके फल 

को -

राम के भरोसे छोड़कर सो जाओ। 

तुलसी ने अन्यत्र भी कहा है -

हम चाकर रघुबीर के पटब  लिखो दरबार ,

तुलसी अब का होहिहैं ,नर को मनसबदार।

उसके (ईश्वर ) दरबार में हमारी चाकरी का पट्टा लिख दो। हम उसी के 

चाकर हैं मनुष्य की गुलामी करके क्या करेंगे। जो भी कर्म करेंगे उसी के 

लिए उसी के भरोसे करेंगे।

एक भरोसे एक बल ,एक आस  विश्वास ,

एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास ,

(राम रूप घनश्याम हित ,चातक तुलसीदास ). 


अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम ,

दास मलूका कह गए सबके दाता राम। 

यहां भी यही भाव। 

एक वृत्तांत सुनाते हैं :

एक मर्तबा कुछ लोग नाव से नदी पार जा रहे थे। अचानक जोर का तूफ़ान 

आया। सब लोग नाव से पानी बाहर उलीचने लगे। एक साधू भी नाव  में 

बैठा था। वह पानी बाहर न उलीचकर नाव के अंदर ठेलने लगा।   लोगों को 

बहुत 

गुस्सा आया। थोड़ी देर बाद तूफ़ान थम गया पानी उतरने लगा वह  अब 

पानी बाहर उलीचने लगा। लोगों ने कहा ,परस्पर पूछा -बड़ा अजीब 

आदमी 

है सब काम उलटे करता है. साधू बोला मैं तो दोनों बार भगवान की ही 

सहायता कर रहा था। जब तूफ़ान बढ़ रहा था तब भी और अब भी जैसी 

राम की मर्जी। 

Birth & Parentage:
Tulsidas was born to Hulsi and Atmaram Shukla Dube in Rajpur, Uttar Pradesh, India in 1532. He was a Sarayuparina Brahmin by birth and an incarnation of Sage Valmiki, the author of the Sanskrit Ramayana. It is said that Tulsidas did not cry at the time of his birth, and was born with all thirty-two teeth intact. In his childhood, he was known as Tulsiram or Ram Bola.

From Family Man to Ascetic:
Tulsidas was passionately attached to his wife Buddhimati until the day she uttered these words: "If you would develop for Lord Rama even half the love that you have for my filthy body, you would certainly cross the ocean of Samsara and attain immortality and eternal bliss". These words pierced his heart. He abandoned home, became an ascetic, and spent fourteen years visiting various sacred places. It is said that Tulsidas met Lord Hanuman, and through him had a vision of Lord Rama.

Immortal Works:
Tulsidas wrote 12 books, the most famous being the Hindi Ramayan — “The Ramcharitmanasa” that is read and worshipped with great reverence in every Hindu home in Northern India. An inspiring book, it contains sweet couplets in beautiful rhyme in praise of Lord Rama. “Vinaya Patrika” is another important book written by Tulsidas.

Wanderings & Miracles:
Tulsidas lived in Ayodhya for some time, and then shifted to Varanasi. He once went to Brindavan to visit the temples of Lord Krishna. Seeing the statue of Krishna, he said, "How shall I describe Thy beauty, O Lord! But Tulsi will bow his head only when You take up bow and arrow in Your hands". The Lord revealed Himself before Tulsidas in the form of Lord Rama with bow and arrows.

It is believed that Tulsidas’s blessings once brought the dead husband of a poor woman back to life. The Moghul emperor in Delhi came to know of this miracle and sent for Tulsidas, asking the saint to perform some miracles. He declined saying, "I have no superhuman power, I know only the name of Rama", only to see himself behind the bars. Tulsi then prayed to Lord Hanuman as countless powerful monkeys invaded the royal court. The emperor released him from prison asked Tulsi to pardon him.

Last Days:
Tulsi left his mortal body and entered the Abode of Immortality and Eternal Bliss in 1623 A.D. at the age of 91. He was cremated at Asi Ghat by the Ganga in the holy city of Varanasi (Benaras).

संवत सोलह सो असि असि गंग  के तीर ,

श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी तज्यो शरीर। 

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

Nothing is born

इस संसार में पैदा कुछ भी नहीं होता है 

Jeeva is one which is endowed with ignorance .

जो अज्ञान लेकर ही इस जगत में आया है वही जीव कहलाता है। पूछा जा 

सकता है। अज्ञान का उद्गम क्या है ? कहाँ से आया अज्ञान। पूछा फिर 

यह भी जाएगा -अज्ञान से पहले क्या था ?

"ज्ञान "-यही उत्तर मिलेगा न जो एक खतरनाक  निष्कर्ष है।  इसका 

मतलब यह हुआ ज्ञान को विस्थापित करके फिर से अज्ञान आ गया था।

 फिर वेद -उपनिषद पढ़ना बेकार हो जाएगा। अज्ञान ही तो हटाते हैं 

उपनिषद इसीलिए इन्हें वेदों का ज्ञान- काण्ड कहा गया है। और इसे 

हटाकर 


अज्ञान आगया ?

यथार्थ यह है -

अज्ञान कभी पैदा ही नहीं हुआ था। 

जीव भी कभी पैदा ही नहीं हुआ था। 

साइबेरिया में रहती थी वह औरत -

जिसके जीवाश्मों से पहला DNA प्राप्त हुआ था। और इस होमिनोइड से 

पहले का विकास क्रम  देखें - पीछे चलते जाएंगे आप जीवों के इस विकास 

क्रम में मकाक मंकी से भी पीछे की ओर  की यात्रा में घड़ी  की सुइयों  को 

पीछे लेते जाइयेगा। जी हाँ अमीबा से भी पहले। कहाँ जाकर रुकेंगे आप ?

महान (प्रधान या महत तत्व पर )ईश्वर ने चाहा और सृष्टि निसृत हो गई।

बना कुछ नहीं पैदा कुछ नहीं हुआ सिर्फ निसृत हुआ एक में से दूसरा 

,दूसरे  

में से तीसरा .......... . 

 पहले आदिपुरुष ब्रह्मा (SECONDARY CREATOR )निसृत हुआ 

ईश्वर में से फिर- महान। 

महान से -

अहंकार।

 अहंकार से पहले आकाश बना। आकाश का गुण ध्वनि (शब्द 

)था। आकाश से वायु बनी जिसमें आकाश का गुण तो आया ही अपना भी 

एक गुण स्पर्श और आ गया। फिर वायु के संघर्षण से पैदा हुई अग्नि 

जिसमें आकाश का गुण ध्वनि ,वायु का गुण स्पर्श और एक अपना गुण 

रूप भी आ गया। अग्नि पहला ऐसा महाभूत था पांच महाभूतों में जिसे 

देखा जा सकता था। अग्नि से जल बना जिसमें ध्वनि -स्पर्श -रूप के 

अलावा रस(स्वाद ) का गुण और जुड़ गया गुणोँ के रूप में। जल से पृथ्वी 

पैदा हुई जिसमें एक और गुण गंध का भी जुड़ गया।

ईश्वर भी कहाँ पैदा हुआ ?

उसे तो कहते ही पुराण है यानी जो पुराने से भी पुराना है अर्वाचीन है और 

सदैव नूतन भी। 

"that which is ancient and ever new is Ishwara "

सबूत ?

"one who is the observer of everything is never born ."  

THERE IS TRIAD OF UNBORN .

JEEVA-ISHWARA -JAGAT 

पूछा जा सकता है फिर बिग बेंग (Big Bang )का क्या होगा ?

"big bang is only talking of manifestation of space ,time and every 

thing else "

जगत ईश्वर से अलग नहीं है वैसे ही जैसे मिट्टी  से बना बर्तन मिट्टी  से 

अलग नहीं है। रूप और आकार हटा दो बर्तन गायब हो जाएगा लेकिन 

उसका सत्य (उपादान कारण )मिट्टी रहेगी। 

"pot is not an entity which is separate from clay "

" golden ornaments are not separate from gold ,there underlying 

truth is gold ,all golden ornaments have only one reality that is gold ."

Where ever there is creation  there is this feminine principle -

Godess Maya (JAGAT )

माया परमात्मा (ईश्वर )से अलग नहीं है। ईश्वर की शक्ति है लेकिन जीव 

के लिए अज्ञान है। शक्ति (ईश्वर )शक्तिमान से अलग नहीं है। 

SHE (MAYA )IS HE (ISHWARA )AND HE IS SHE THAT IS 

WHY ALL 

THE HINDU DEITIES ARE HAPPILY MARRIED .THERE IS 

NO SEPARATION .

JEEVA ,ISHAWAR ,MAYA ARE  ALL UNBORN .

MAYA IS ONE WITH JAGAT .

MAYA IS ONE WITH JEEVA AS IGNORANCE .

THE SAME MAYA MANIFESTS AS THE POWER OF GOD 

.SHE IS ALL KNOWLEDGE AND ALL POWER WITH 

ISHAWARA AND ALL IGNORANCE WITH JEEVA i.e  IS 

THE 

DILEMMA.

जो पैदा नहीं होता उसका अस्तित्व देश ,काल और किसीवस्तु पर 

निर्भर  नहीं करेगा जैसे आत्मा -परमात्मा जबकि -

जगत आज है कल नहीं है उसका अस्तित्व देश ,काल और वस्तु पर 

निर्भर 

करता है। 

जायते गच्छति इति जगत :

SELF(SOUL ) IS LIMITLESS ,INDEPENDENT OF SPACE 

TIME AND 

ANY OTHER OBEJECT .

सत्यम ज्ञानम् अनन्तं(सच्चिदानंद -सत +चित +आनंद )-यही मेरा 

स्वरूप है। 
-
IT IS CONSCIOUSNESS WHOSE EXISTENCE IS LIMITLESS .

JAGAT HAS EXISTENCE DEPENDENT ON SPACE AND 

TIME .

ATMA CAN NOT BE OBJECTIFIED BECAUSE IT IS THE 

SAME IN EVERY PERSON .

THER IS ONLY ONE I ONLY ONE CONSCIOUS 

OBJECT.DIFFERENT PERSONS HAVE DIFFERENT 

UPADHIS 

(BODIES)BECAUSE OF THEIR THREE  TYPES OF KARMAS 

SANCHIT ,PRARABDH ,AGAMI KARMAS  ARE DIFFERENT 

IN THEM .

NOTHING HERE IN THE UNIVERSE IS WITHOUT THE 

PRESENCE OF ISHAWARA .

ALL ISNESS (ISES ,PLURAL OF IS )IS ISHWAR .

IS का सम्बन्ध ईश्वर से है। 

यह जगत ईश्वर की ही अभिव्यक्ति है इसकी हर चीज़ में वह मौजूद है 

लेकिन वह स्वयं इनमें से कोई भी चीज़ नहीं है। 

फूल ,लकड़ी की मेज और स्वयं तीनों का होना ईश्वर पर निर्भर करता है। 

उनकी इज़्नेस ईश्वर है लेकिन ईश्वर न फूल है न लकड़ी है न स्वान।

FLOWER IS .

EXISTENCE OF FLOWER OR ANY OTHER OBEJECT 

DEPENDS ON ISHWARA . BUT ISHWARA IS NONE OF 

THEM .

THE ISNESS OF FLOWER IS ISHWARA .

THE I IN THE ISHAWARA IS ME (I).DUE TO THE EGO 

(AHANKAR )THE I IS SEPARATED FROM ISHAWARA AND 

CONSIDERS HIMSELF THE DOER AND THE ENJOYER 

(THE 

EXPERINECER )AND HENCE ALL THE IGNORANCE SINCE 

ETERNITY .

JEEVA HAS BECOME PEEVA AND IS DOING PAIN ,PAIN 

,PAIN (पै ,पैं ,पैं ,पीं पीं ).

श्वेताश्वतर उपनिषद के पहले अध्याय का यह नौवां मंत्र (श्लोक )है 





सन्दर्भ -सामिग्री :



रविवार, 21 सितंबर 2014

कंचन तजना सहज है ,सहज त्रिया का नेह , मान ,बड़ाई, ईरखा (ईर्ष्या का प्राकृत रूप )तीनों दुर्लभ येह।

(१) कंचन तजना सहज है ,सहज त्रिया का नेह ,

मान ,बड़ाई, ईरखा (ईर्ष्या का  प्राकृत रूप )तीनों दुर्लभ येह।



महाकवि तुलसीदास इस दोहे में कहतें हैं कि जब तक तुम्हारे मन में किसी के भी प्रति ईर्ष्या भाव है ,तुम आत्मश्लाघा (आत्म प्रशंशा )से ग्रस्त हो ,सब जगह मान चाहते हो ,सब जगह मी फस्ट भाव लिए हो तुम्हारा अहंकार शिखर छू रहा है तब तक तुम्हें ईश्वर के दर्शन नहीं होंगें। इन्हें तजना सहज नहीं है।

स्वर्ण के प्रति मोह और नारी के  प्रति आसक्ति  सकती एक बार व्यक्ति त्याग सकता है लेकिन बड़े बड़े ऋषि मुनि भी मान -सम्मान ,बड़ाई और ईर्ष्या से ऊपर नहीं उठ सके हैं ये तीनों हमें हमारे असली स्वरूप ब्रह्मण से दूर रखते हैं  . जबकि ब्रह्म (सेल्फ )तो सदैव  ही आनंद स्वरूप है ,सनातन चेतना है ,सनातन अस्तित्व है। फिर अपने ज्ञान का इस नश्वर शरीर का गुमान कैसा ?कैसा मान और कैसा अपमान?शरीर का न मान होता है न अपमान शरीर तो ख़ाक हो जाता है। फिर भी हमें कोई अप्रिय बोल देता है तो हम बरसों अकड़े रहते हैं।

ये तन आखिर ख़ाक बनेगा क्यों मगरूर गरूरी में ?

(२) पानी  बाढ़ै नाव में ,घर में  बाढ़ै दाम ,

दोनों हाथ उलीचिये यही सज्जन को काम।

कवि कहता है धन से ,अतिरिक्त धन से आसक्ति अच्छी नहीं है। धन अपने आप में बुरा नहीं है आसक्ति बुरी है। ये फिर और कुछ नहीं करने देती ,हम उतना ही धन खर्च करें जितना हमारे शरीर निर्वाह के लिए ज़रूरी है शेष दान कर दें परोपकार में लगा दें ,वरना धन तो जाता ही है सजा अलग मिलती है इस लोक में धन के पकड़े जाने पर ,परलोक में दूसरों का हिस्सा हड़पने की वजह से ,यह वैसे ही जैसे जीवन निर्वाह के लिए यद्यपि जल ज़रूरी है यहां तक के जल को  जीवन भी कह दिया गया है उसी जल का आधिक्य हमारी जल-विषाक्तण की वजह से मृत्यु की वजह भी बन सकता है आप किसी व्यक्ति को एक साथ १२ लीटर पानी पिला दें वह वाटर टोक्सीमिया से मर जाएगा। गुर्दे एक साथ  इतना पानी हैंडिल ही नहीं कर सकते। नाव में जल बढ़ा जाने पर नाव डूब जाती है अत :जल की तीव्र निकासी करनी पड़ती है।

Shvetashvatara Upanishad Introductionby Advaita Academy720 views

शनिवार, 20 सितंबर 2014

ऊंचे पानी न टिके ,नीचे ही ठहराय , नीचा होय सो भरि पिये ,ऊंचा प्यासा जाय।

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ऊंचे पानी न टिके ,नीचे ही ठहराय ,

नीचा होय सो भरि पिये ,ऊंचा प्यासा जाय। 

महाकवि कबीर अपनी इस साखी में अहंकार की भर्तस्ना करते हुए उसकी तुलना ऊंचाई से करते हैं। तथा जल की ज्ञान से। 


जैसे जल का सहज प्रवाह  ऊंचाई से (Higher level ,Higher potential energy )से नीचाई की तरफ होता है वैसे ही ज्ञान अहंकारी व्यक्ति का साथ छोड़ जाता है वह सूचना बनके रह जाता है । और सहज ही ज्ञान का आश्रय अपने को विनम्र समझने वाले व्यक्ति को प्राप्त हो जाता है। श्रीमती  माया देवी जो ब्रह्मा की सहचरी हैं नीचाई पर खड़े अपने को तुच्छ तृणवत समझने वाले अहंकार शून्य व्यक्ति को ज्ञान का आश्रय लेने देतीं हैं।अहंकारी का ज्ञान नष्ट कर देतीं हैं। 

"water does not remain above (at higher level );it naturally flows down .Those who are low and unassuming drink (God,s grace )to their heart's content ,while those who are high and pompous remain thirsty." 

है कहूँ तो है नहीं ,और नहीं कहूँ तो है ,

है और नहिं  के बीच में ,जो कुछ है सो है। 

इस साखी में कबीर भगवान (Personalty of God Head )के व्यक्त और अव्यक्त रूप की ओर  संकेत करते हैं। इसीलिए कबीर कहते हैं -यदि मैं कहता हूँ कि वह (भगवान )है तो लोग कहेंगे कि  है तो दिखाओ। लेकिन वह इन चरम चक्षुओं से कैसे दिखेगा उसे देखने के लिए प्रभु कृपा प्रदत्त ज्ञान चक्षु चाहिए। और यदि मैं यह कहूँ कि वह  नहीं है तो ये सारा प्रपंच (ईश्वर की अभिव्यक्ति ,ये संसार )कहाँ से आया ?

अगर घड़ा है तो भले कुम्हार वहां न हो घड़ा पूछ तो सकता है कुम्हार कहाँ है।  इसका मतलब यह तो नहीं है कि कुम्हार नहीं है।घड़े का होना ही यह सिद्ध करता है क़ि कुम्हार का अस्तित्व है। 

सच तो यह है :

अस्ति भाति प्रियं ,नामम्  रूपम् -ये पांच गुण हरेक वस्तु के हैं। 

यहां पहले तीन अस्ति -है ,भाति -दिखता है आलोकित  होता है ,तथा प्रियं

 -आकर्षित करता है। 

यानी -

It is .It shines .It attracts .

यह  वही है :

सत्यम -ज्ञानम् -अनन्तं 

यह वही है:

सच्चिदानंद -सत +चित +आनंद  

consciousness which is eternal and limitless .

ईश्वर के लिए ही प्रयुक्त हुआ है।

 तथा नामम ,रूपम -

संसार (जगत )के लिए प्रयुक्त हुआ है।नाम और रूप 

हटा दो संसार गायब हो जाएगा। 

गच्छति इति जगत : 

HERE THE CREATED(सृष्टि या जगत ) ,THE CREATOR(नैमित्तिक कारण i .e the efficient cause )  AND THE MATERIAL USED IN CREATION (उपादान कारण सृष्टि का ,(i .e materail cause ) ARE THE ONE AND THE SAME AND NO SECOND . 

THE CREATIVE POWER OF BRAHMAN IS MAYA (मिथ्या ). 

THIS MAYA EXISTS BETWEEN THE SATYA AND ASATYA SO THAT THE WORLD (जगत )MAY BE MORE FUNNY .MAYA IS THE CAUSE OF OUR DELUSION .

आवरण और विक्षेप इसकी दो शक्तियां हैं जो हमें सत्य से दूर रखतीं हैं। हम अपने आपको देह -मन -बुद्धि तंत्र ही मानते रह जाते हैं।