- बौद्धिक भकुए चीन के राष्ट्रवादी गुलाम ,कांग्रेस के कूकर आज ज्यादा ही भौं भौं कर रहे हैं। हद तो यह है हिन्दू आतंकवाद जैसे शब्द सेक्युलर ढाँचे में फिट करने की लगातार कोशिश की गई है।
- अब कोशिश अयोध्या के बरक्स शबरीमला (सबरीमाला )को रखने की हमारे रक्तरँगी लेफ्टिए कर रहे हैं। ये महिला ब्रिगेड उन्हीं लोगों की है जो माथे पे बड़ी बिंदी लगातीं हैं तुलसी वन निधिवन जैसे प्रतीकात्मक वृंदा और सीताराम खे -चारि जैसे नाम रखे घूम रहे हैं इन्हीं प्रतीकों का नाश करने के लिए। क्या यह आकस्मिक है महिलायें ही महिलाओं के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहीं हैं।
- सबरीमला के पावित्र्य के नाम पर। जिस यौनि से निकलके आये जिसके रक्तस्राव से पोषित पल्लवित हुए उसी से ख़तरा। कैसा खतरा और कैसा पावित्र्य है यह इस बात को नाभि से नीचे के संबंधों को ही सम्बन्ध बूझने वाले कामोदरी काम -रेड्डी समझेंगे भी कैसे ?आप मौज़ू सवाल उठा रहे हैं हैं भाई साहब ,उस दौर में जबकि चोट्टे संतों को चोर कहने लगें हैं। साध्वियों को जो प्रताड़ित करते रहे थर्ड डिग्री अंग्रेज़ों को भी लजाने वाले पूरी बे -शर्मी से आज़माते रहे के ,कहीं से ,कैसी भी इसका हौसला टूटे। अरे जो पुत्रेष्णा ,,वित्तेषणा ,हर प्रकार की वासना से ऊपर उठ संन्यास में प्रवेश ले चुकी थीं उनके आत्म बल को नेहरुपंथी अवशेषी कांग्रेस क्या खाकर तुड़वाती ?
- रायफ़ैल क्या किसी की रखैल है ?कृपया बतलायें जिसके बारे में संसद में खासी बहस हो चुकी है। एक साले का नामा आया था बोफोर्स में दूसरे का रैफेल में।
- उन्नीस बहुत दूर नहीं है नेहरू पंथी अवशेषी कांग्रेस के चार उच्चक्के चालीस चोर भी सिमट कर चार पर आ गए हैं।लेफ्टीयों की हालत तो और भी बदतर ले देकर एक केरल ही बचा है उसे भी सांप्रदायिक आग और हत्याओं के हवाले कर रहें हैं।
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शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018
बौद्धिक भकुए चीन के राष्ट्रवादी गुलाम ,कांग्रेस के कूकर आज ज्यादा ही भौं भौं कर रहे हैं। हद तो यह है हिन्दू आतंकवाद जैसे शब्द सेक्युलर ढाँचे में फिट करने की लगातार कोशिश की गई है
रविवार, 21 अक्टूबर 2018
अकर्म एवं भक्ति, SI-11, by shri Manish Dev ji (Maneshanand ji) Divya Srijan Samaaj
सन्दर्भ -सामिग्री :https://www.youtube.com/watch?v=otOjab3ALy4
जो अकर्म में कर्म को और कर्म में अकर्म को देख लेता है बुद्धिमान वही है। भगवान् अर्जुन को अकर्म और कर्म के मर्म को समझाते हैं। कर्म जिसका फल हमें प्राप्त होता है वह है और अकर्म वह जिसका फल हमें प्राप्त नहीं होता है।
वह योगी सम्पूर्ण कर्म करने वाला है जो इन दोनों के मर्म को समझ लेता है। अर्जुन बहुत तरह के विचारों से युद्ध क्षेत्र में ग्रस्त है । युद्ध करूँ न करूँ।
सफलता पूर्वक कर्म करना है तो इस रहस्य को जान ना ज़रूरी है। अकर्म वह है -जिसका फल प्राप्त नहीं होता।
जो कर्म अनैतिक है जिसे नहीं करना चाहिए वही विकर्म है।वह कर्म जो नहीं करना चाहिए जो निषेध है वह विकर्म है।
जिस दिन कर्म और अकर्म का भेद समझ आ जाएगा। मनुष्य का विवेक जागृत होगा उसी दिन भक्ति होगी।तब जब घोड़े वाला चश्मा हटेगा और उसके स्थान पर विवेक का चश्मा लगेगा।
भगवान् अर्जुन से कहते हैं :हे अर्जुन !तू कर्म अकर्म और विकर्म के महत्व को मर्म को जान तभी तेरे प्रश्नों का समाधान होगा के पाप क्या है, पुण्य क्या है क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए ?
कर्म वह है जिसका फल प्राप्त होता है और अकर्म वह है जिसका फल प्राप्त नहीं होता।
कुछ विद्वान विकर्म का अर्थ निषेध कर्म न लगाकर विशेष कर्म बतलाते हैं लेकिन गीता के सन्दर्भ में यह गलत है भगवान् कहीं भी अर्जुन को विकर्म का अर्थ नहीं समझाते। संस्कृत व्याकरण के अनुसार भी यह वह कृति है जो विकृत हो गई है। विकृति ही है विकर्म।जो कृति अच्छी नहीं है वह विकर्म है डिफ़ॉर्मेशन है।
शेष का विलोम है विशेष। आम खाने के बाद गुठली आपने नहीं खाया वह शेष है जो गूदा आपने खाया वह विशेष है।
सब कुछ करते हुए भी व्यक्ति अकर्म में रह सकता है ?
जीव अनेक कर्म करता है यदि कर्मों के फल में उसकी स्पृहा न रहे तो वह सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करता। उसे अपना उद्देश्य ज्ञात हो जाता है। भगवान् अर्जुन को यही समझाते हैं :"मैं सब कुछ करते हुए भी सब कर्मों से अलिप्त रहता हूँ क्योंकि इनमें मेरी स्पृहा नहीं रहती।
जो अनहद नाद के नशे में डूब गया जो परमात्मा के नशे में रहकर सब कर्म करता है उसे कर्म फिर बांधता नहीं है। फल की स्पृहा रखते हुए जो कर्म किया जाता है वह कर्म बांधता है।
राजा जनक एक साथ दो तलवार चलाते हैं एक ज्ञान की एक कर्म की। गृहस्थ में रहते हुए सब कुछ करते हैं लेकिन लक्ष्य उनका परमात्मा है। इसलिए उनका (ग्राहस्थ्य) गार्हस्थ्य ( गृहस्थय )कर्म उन्हें बांधता नहीं है।
हमारे मन के उद्देश्य से कर्म का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पक्ष उजागर होतें हैं।वेषधारी साधू ,लोगों से बहुत प्यार से मिल रहा है लेकिन उनको ठग रहा है उनके साथ बरजोरी कर रहा है। तो उसका प्यार से मिलना फल नहीं देगा। उसके मीठे ठगाऊ बोल फल नहीं देंगे उसकी ठगी फल देगी। क्योंकि वह ठगी ही उसका उद्देश्य है।
इसलिए भगवान् अर्जुन से कहते हैं तू मुझे स्मरण करता हुआ कर्म कर तुझे कोई पाप नहीं लगेगा।
जिस दिन कर्म और अकर्म का भेद समझ आ जाएगा। मनुष्य का विवेक जागृत होगा उसी दिन भक्ति होगी।
जो अकर्म में कर्म को और कर्म में अकर्म को देख लेता है बुद्धिमान वही है। भगवान् अर्जुन को अकर्म और कर्म के मर्म को समझाते हैं। कर्म जिसका फल हमें प्राप्त होता है वह है और अकर्म वह जिसका फल हमें प्राप्त नहीं होता है।
वह योगी सम्पूर्ण कर्म करने वाला है जो इन दोनों के मर्म को समझ लेता है। अर्जुन बहुत तरह के विचारों से युद्ध क्षेत्र में ग्रस्त है । युद्ध करूँ न करूँ।
सफलता पूर्वक कर्म करना है तो इस रहस्य को जान ना ज़रूरी है। अकर्म वह है -जिसका फल प्राप्त नहीं होता।
जो कर्म अनैतिक है जिसे नहीं करना चाहिए वही विकर्म है।वह कर्म जो नहीं करना चाहिए जो निषेध है वह विकर्म है।
जिस दिन कर्म और अकर्म का भेद समझ आ जाएगा। मनुष्य का विवेक जागृत होगा उसी दिन भक्ति होगी।तब जब घोड़े वाला चश्मा हटेगा और उसके स्थान पर विवेक का चश्मा लगेगा।
भगवान् अर्जुन से कहते हैं :हे अर्जुन !तू कर्म अकर्म और विकर्म के महत्व को मर्म को जान तभी तेरे प्रश्नों का समाधान होगा के पाप क्या है, पुण्य क्या है क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए ?
कर्म वह है जिसका फल प्राप्त होता है और अकर्म वह है जिसका फल प्राप्त नहीं होता।
कुछ विद्वान विकर्म का अर्थ निषेध कर्म न लगाकर विशेष कर्म बतलाते हैं लेकिन गीता के सन्दर्भ में यह गलत है भगवान् कहीं भी अर्जुन को विकर्म का अर्थ नहीं समझाते। संस्कृत व्याकरण के अनुसार भी यह वह कृति है जो विकृत हो गई है। विकृति ही है विकर्म।जो कृति अच्छी नहीं है वह विकर्म है डिफ़ॉर्मेशन है।
शेष का विलोम है विशेष। आम खाने के बाद गुठली आपने नहीं खाया वह शेष है जो गूदा आपने खाया वह विशेष है।
सब कुछ करते हुए भी व्यक्ति अकर्म में रह सकता है ?
जीव अनेक कर्म करता है यदि कर्मों के फल में उसकी स्पृहा न रहे तो वह सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करता। उसे अपना उद्देश्य ज्ञात हो जाता है। भगवान् अर्जुन को यही समझाते हैं :"मैं सब कुछ करते हुए भी सब कर्मों से अलिप्त रहता हूँ क्योंकि इनमें मेरी स्पृहा नहीं रहती।
जो अनहद नाद के नशे में डूब गया जो परमात्मा के नशे में रहकर सब कर्म करता है उसे कर्म फिर बांधता नहीं है। फल की स्पृहा रखते हुए जो कर्म किया जाता है वह कर्म बांधता है।
राजा जनक एक साथ दो तलवार चलाते हैं एक ज्ञान की एक कर्म की। गृहस्थ में रहते हुए सब कुछ करते हैं लेकिन लक्ष्य उनका परमात्मा है। इसलिए उनका (ग्राहस्थ्य) गार्हस्थ्य ( गृहस्थय )कर्म उन्हें बांधता नहीं है।
हमारे मन के उद्देश्य से कर्म का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पक्ष उजागर होतें हैं।वेषधारी साधू ,लोगों से बहुत प्यार से मिल रहा है लेकिन उनको ठग रहा है उनके साथ बरजोरी कर रहा है। तो उसका प्यार से मिलना फल नहीं देगा। उसके मीठे ठगाऊ बोल फल नहीं देंगे उसकी ठगी फल देगी। क्योंकि वह ठगी ही उसका उद्देश्य है।
इसलिए भगवान् अर्जुन से कहते हैं तू मुझे स्मरण करता हुआ कर्म कर तुझे कोई पाप नहीं लगेगा।
जिस दिन कर्म और अकर्म का भेद समझ आ जाएगा। मनुष्य का विवेक जागृत होगा उसी दिन भक्ति होगी।
शनिवार, 20 अक्टूबर 2018
कर्म, अकर्म एवं विकर्म by Shri Manish Dev ji(Maneshanand ji), SI-10, Divya Srijan Samaaj
प्रकृति स्वयं कर्म परायण है। ये जीव जो प्रकृति के वश रहता है यह भी कर्म परायण है प्रकृति (इसके तीन गुण )जीव से कर्म करवा ही लेते है। भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कर्म ,अकर्म और विकर्म का स्वरूप समझाते हुए कहते हैं -हे अर्जुन
कर्म क्या है और अकर्म क्या है इसे लेकर बड़े बड़े ग्यानी व्यामोह में फंसे रहते हैं। कर्मों की गति बड़ी गहन है।
आखिर दुनिया में बशर को रहना वाहिद किस तरह ,
जिस तरह तालाब के पानी में रहता हैं कमल।
वह रहता पानी में है लेकिन उसका मुख सूर्य की और रहता है।
राजा जनक रहते तो राजपाट में हैं लेकिन उनका मन परमात्मा में रहता है।
कर्म विकर्म (निषेध कर्म )तब हो जाता है जब व्यक्ति का सम्पूर्ण स्वार्थ उस कर्म में लग जाता है। समाज में धर्म विरोधी तत्व सक्रिय हैं कुछ ऐसे ही तत्व कहते हैं महाभारत को घर में मत रखो उससे घर में कलह कलेश हो जाएगा यह दुष्प्रचार करते हैं । सनातन धर्म विरोधी तत्वों ने ऐसा प्रचार किया है।
दूसरे ऐसे लोग हैं जिन्होनें महाभारत कभी पढ़ी ही नहीं वह कृष्ण पर आरोप लगाते हैं। आरोप यह है :
भगवान् कृष्ण ने महाभारत करवा दिया। अर्जुन को बारहा प्रेरित किया तू युद्ध कर युद्ध कर कहकर। महाभारत को पढ़ेंगे तो पता चलेगा महाभारत को रोकने का सबसे बड़ा प्रयास भगवान् कृष्ण ने ही किया जो राजा बन के नहीं दूत बन के गये। कहा पांच गाँव ही दे दो पांडवों को उसके इंकार करने पर पांच मकान ही देने को कहते हैं दुर्योधन से.
दुर्योधन भगवान् को बंदी बनाने का प्रयास करते हैं कहते हुए सुईं की नौंक के बराबर भी भूमि पांडवों को युद्ध के बिना नहीं दूंगा।
भगवान् तो कर्म करना सिखाते हैं। कर्म कैसे करना है यह सिखाते हैं। कर्म अकर्म और विकर्म का रहस्य समझाते हैं। अर्जुन तो निमित्त मात्र हैं यह सन्देश हम सभी के लिए है।
सन्दर्भ सामिग्री :
कर्म, अकर्म एवं विकर्म by Shri Manish Dev ji(Maneshanand ji), SI-10, Divya Srijan Samaaj
सोमवार, 15 अक्टूबर 2018
शशि थरूर का #Metoo शशि थरूर का #Metoo
यदि किसी कहानी कथा का आरम्भ उसका प्रवेश द्वार है तो कहानी या पोस्ट का शीर्षक उस द्वार पर लिखा सुस्वागतम है।
स्वागत है शशि थरूर जी आपका। आप भारत देश को समझा रहें हैं श्रेष्ठ हिन्दू ,श्रेष्ठ मुसलमान ,श्रेष्ठ ईसाई ,श्रेष्ठ बौद्ध ,श्रेष्ठ सिख ,श्रेष्ठ पारसी ,बनिया ,ब्राह्माण,शूद्र कौन ?
(१ )पूछा जा सकता है क्या हिन्दू को आत्मा रक्षा का अधिकार नहीं है ?
(२ )क्या मंदिर तोड़के मस्जिद बनाने वाला मुसलमान श्रेष्ठ है ?
(३ )क्या वह मुसलमान श्रेष्ठ है जिसे भारत देश को तोड़ने के कामों में खर्ची के लिए हवाला से पैसा आ रहा है ?
(४ )घाटी में अलगाव वादियों का समर्थन करने वाला हिन्दू या मुसलमान श्रेष्ठ है ?
(५ )वह हिन्दू श्रेष्ठ है जो नेहरू की तरह अपनी बीवी को तपेदिक में छोड़ के भाग गया था उसके पास समय नहीं था ?
(६ )वह थरूर श्रेष्ठ है जिसने बीवी को आत्महत्या के कगार पे ले जाकर छोड़ दिया जबकि वह पहले से अवसाद ग्रस्त थी,बायकायदा उसका इलाज़ भी चल रहा था ?
वह जुल्फिकार अली भुट्टो श्रेष्ठ थे जो कहते थे भारत के सीने पे घाव करते चलो हज़ार हज़ार। क्या आप पड़ोसी पाकिस्तान को ये सन्देश देना चाहते हैं आप हलाला से पैसा भेजते रहो हम आयोध्या में राम मंदिर नहीं बनने देंगे ?
आप भले नेहरू पंथी कांग्रेस के अवशेष राहुल को दीक्षा देते रहो इसमें किसी को क्या एतराज हो सकता है ,भले उनका शिवाम्बु पान करते रहो लेकिन एक बात समझ लो एक स्पंदन सुन लो जो आज भी एडबिना माउंबेटन की कब्र से छन छन के आ रहा है :
#Meetoo Meetoo Meetoo
ये मीटू और इस देश को हलाल करने के लिए हर काम करने को आतुर आप जैसे लोग ये समझ लें :
जो गद्दार होता है वह विचारक नहीं होता। आप को मुगालता है गफलत में हैं आप के ,आप इस देश के सबसे बड़े विचारक हैं हित चिंतक हैं।
Congress leader Shashi Tharoor on Monday clarified his stance after his recent remarks on the construction of Ram temple at the disputed site in Ayodhya stirred up a controversy. “I condemn the malicious distortion of my words by some media in the service of political masters. I said: “most Hindus would want a temple at what they believe to be Ram’s birthplace. But no good Hindu would want it to be built by destroying another’s place of worship,” the Thiruvananthapuram MP wrote on Twitter.
Tharoor insisted that it was his “personal opinion” and that he was not speaking on behalf of his party. “I was asked for my personal opinion at a literary festival & gave it as such. I am not a Spokesperson for my party & did not claim to be speaking for @incindia,” he added.
I condemn the malicious distortion of my words by some media in the service of political masters. I said: “most Hindus would want a temple at what they believe to be Ram’s birthplace. But no good Hindu would want it to be built by destroying another’s place of worship.”
Speaking at ‘The Hindu Lit for Life Dialogue 2018’ in Chennai on Sunday, the Congress leader referred to the demolition of Babri Masjid. According to The Hindu, Tharoor said while a vast majority of Hindus believes that Ayodhya was the birthplace of Lord Ram, no good Hindu would want to see a Ram temple built “by demolishing somebody else’s place of worship.”
Union Minister Prakash Javadekar slammed Tharoor and said his remark “shows how cut-off he is from reality”. “Astonished that Shashi Tharoor believes that true Hindus don’t want a Ram Temple in Ayodhya. This could be a view of Tharoor or Rahul Gandhi, not of ppl. This shows how cutoff they are from reality and how they only become Hindu during elections,” Javadekar was quoted as saying by ANI.
सन्दर्भ सामिग्री :
https://indianexpress.com/article/india/shashi-tharoor-ram-temple-babri-masjid-ayodhya-congress-bjp5402923/
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